बुधवार, 6 मई 2015

16 पौराणिक कथाएं - पिता के वीर्य और माता के गर्भ के बिना जन्मे पौराणिक पात्रों की

हमारे हिन्दू धर्म ग्रंथो वाल्मीकि रामायण, महाभारत आदि में कई ऐसे पात्रों का वर्णन है जिनका जन्म बिना माँ के गर्भ और पिता के वीर्य के हुआ था। यहां हम आपको कुछ ऐसे ही पौराणिक पात्रो क़े ज़न्म की 16  कहानी बतायेँगे। इनमे से कई पात्रो के ज़न्म मे माँ के गर्भ का कोई योगदान नहीं था तो कुछ पात्रों के ज़न्म में पिता क़े वीर्य का जबकि कुछ मैं दोनो क़ा हीं।


Child in mother womb
माँ के गर्भ में बच्चा  

1. धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर के जन्म कि कथा :

हस्तिनापुर नरेश शान्तनु और रानी सत्यवती के चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक दो पुत्र हुये। शान्तनु का स्वर्गवास चित्रांगद और विचित्रवीर्य के बाल्यकाल में ही हो गया था इसलिये उनका पालन पोषण भीष्म ने किया। भीष्म ने चित्रांगद के बड़े होने पर उन्हें राजगद्दी पर बिठा दिया लेकिन कुछ ही काल में गन्धर्वों से युद्ध करते हुये चित्रांगद मारा गया। इस पर भीष्म ने उनके अनुज विचित्रवीर्य को राज्य सौंप दिया। अब भीष्म को विचित्रवीर्य के विवाह की चिन्ता हुई। उन्हीं दिनों काशीराज की तीन कन्याओं, अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का स्वयंवर होने वाला था। उनके स्वयंवर में जाकर अकेले ही भीष्म ने वहाँ आये समस्त राजाओं को परास्त कर दिया और तीनों कन्याओं का हरण कर के हस्तिनापुर ले आये। बड़ी कन्या अम्बा ने भीष्म को बताया कि वह अपना तन-मन राज शाल्व को अर्पित कर चुकी है। उसकी बात सुन कर भीष्म ने उसे राजा शाल्व के पास भिजवा दिया और अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य के साथ करवा दिया।


राजा शाल्व ने अम्बा को ग्रहण नहीं किया अतः वह हस्तिनापुर लौट कर आ गई और भीष्म से बोली, "हे आर्य! आप मुझे हर कर लाये हैं अतएव आप मुझसे विवाह करें।" किन्तु भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा के कारण उसके अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। अम्बा रुष्ट हो कर परशुराम के पास गई और उनसे अपनी व्यथा सुना कर सहायता माँगी। परशुराम ने अम्बा से कहा, "हे देवि! आप चिन्ता न करें, मैं आपका विवाह भीष्म के साथ करवाउँगा।" परशुराम ने भीष्म को बुलावा भेजा किन्तु भीष्म उनके पास नहीं गये। इस पर क्रोधित होकर परशुराम भीष्म के पास पहुँचे और दोनों वीरों में भयानक युद्ध छिड़ गया। दोनों ही अभूतपूर्व योद्धा थे इसलिये हार-जीत का फैसला नहीं हो सका। आखिर देवताओं ने हस्तक्षेप कर के इस युद्ध को बन्द करवा दिया। अम्बा निराश हो कर वन में तपस्या करने चली गई।

विचित्रवीर्य अपनी दोनों रानियों के साथ भोग विलास में रत हो गये किन्तु दोनों ही रानियों से उनकी कोई सन्तान नहीं हुई और वे क्षय रोग से पीड़ित हो कर मृत्यु को प्राप्त हो गये। अब कुल नाश होने के भय से माता सत्यवती ने एक दिन भीष्म से कहा, "पुत्र! इस वंश को नष्ट होने से बचाने के लिये मेरी आज्ञा है कि तुम इन दोनों रानियों से पुत्र उत्पन्न करो।" माता की बात सुन कर भीष्म ने कहा, "माता! मैं अपनी प्रतिज्ञा किसी भी स्थिति में भंग नहीं कर सकता।"

यह सुन कर माता सत्यवती को अत्यन्त दुःख हुआ। तब  उन्हें अपने ज्येष्ठ पुत्र वेदव्यास का स्मरण किया।स्मरण करते ही वेदव्यास वहाँ उपस्थित हो गये। सत्यवती उन्हें देख कर बोलीं, "हे पुत्र! तुम्हारे सभी भाई निःसन्तान ही स्वर्गवासी हो गये। अतः मेरे वंश को नाश होने से बचाने के लिये मैं तुम्हें आज्ञा देती हूँ कि तुम नियोग विधि से उनकी पत्नियों से सन्तान उत्पन्न करो।" वेदव्यास उनकी आज्ञा मान कर बोले, "माता! आप उन दोनों रानियों से कह दीजिये कि वो मेरे सामने से निवस्त्र हॉकर गुजरें जिससे की उनको गर्भ धारण होगा।"  सबसे पहले बड़ी रानी अम्बिका और फिर छोटी रानी छोटी रानी अम्बालिका गई पर अम्बिका ने उनके तेज से डर कर अपने नेत्र बन्द कर लिये जबकि अम्बालिका वेदव्यास को देख कर भय से पीली पड़ गई। वेदव्यास लौट कर माता से बोले, "माता अम्बिका का बड़ा तेजस्वी पुत्र होगा किन्तु नेत्र बन्द करने के दोष के कारण वह अंधा होगा जबकि अम्बालिका के गर्भ से  पाण्डु रोग से ग्रसित पुत्र पैदा होगा " ।  यह जानकार इससे माता सत्यवती ने बड़ी रानी अम्बिका को पुनः वेदव्यास के पास जाने का आदेश दिया। इस बार बड़ी रानी ने स्वयं न जा कर अपनी दासी को वेदव्यास के पास भेज दिया। दासी बिना किसी संकोच के वेदव्यास के सामने से गुजरी।   इस बार वेदव्यास ने माता सत्यवती के पास आ कर कहा, "माते! इस दासी के गर्भ से वेद-वेदान्त में पारंगत अत्यन्त नीतिवान पुत्र उत्पन्न होगा।" इतना कह कर वेदव्यास तपस्या करने चले गये।

समय आने पर अम्बिका के गर्भ से जन्मांध धृतराष्ट्र, अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पाण्डु तथा दासी के गर्भ से धर्मात्मा विदुर का जन्म हुआ।

2. कौरवों के जन्म की कथा :


एक बार महर्षि वेदव्यास हस्तिनापुर आए। गांधारी ने उनकी बहुत सेवा की। जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने गांधारी को वरदान मांगने को कहा। गांधारी ने अपने पति के समान ही बलवान सौ पुत्र होने का वर मांगा। समय पर गांधारी को गर्भ ठहरा और वह दो वर्ष तक पेट में ही रहा। इससे गांधारी घबरा गई और उसने अपना गर्भ गिरा दिया। उसके पेट से लोहे के समान एक मांस पिण्ड निकला।

महर्षि वेदव्यास ने अपनी योगदृष्टि से यह सब देख लिया और वे तुरंत गांधारी के पास आए। तब गांधारी ने उन्हें वह मांस पिण्ड दिखाया। महर्षि वेदव्यास ने गांधारी से कहा कि तुम जल्दी से सौ कुण्ड बनवाकर उन्हें घी से भर दो और सुरक्षित स्थान में उनकी रक्षा का प्रबंध कर दो तथा इस मांस पिण्ड पर जल छिड़को। जल छिड़कने पर उस मांस पिण्ड के एक सौ एक टुकड़े हो गए। व्यासजी ने कहा कि मांस पिण्डों के इन एक सौ एक टुकड़ों को घी से भरे कुंडों में डाल दो। अब इन कुंडों को दो साल बाद ही खोलना। इतना कहकर महर्षि वेदव्यास तपस्या करने हिमालय पर चले गए। समय आने पर उन्हीं मांस पिण्डों से पहले दुर्योधन और बाद में गांधारी के 99 पुत्र तथा एक कन्या उत्पन्न हुई।

3. पांडवों के जन्म की कथा : 

पांचो पांडवो का जन्म भी बिना पिता के वीर्य के हुआ था। एक बार राजा पाण्डु अपनी दोनों पत्नियों - कुन्ती तथा माद्री - के साथ आखेट के लिये वन में गये। वहाँ उन्हें एक मृग का मैथुनरत जोड़ा दृष्टिगत हुआ। पाण्डु ने तत्काल अपने बाण से उस मृग को घायल कर दिया। मरते हुये मृग ने पाण्डु को शाप दिया, "राजन! तुम्हारे समान क्रूर पुरुष इस संसार में कोई भी नहीं होगा। तूने मुझे मैथुन के समय बाण मारा है अतः जब कभी भी तू मैथुनरत होगा तेरी मृत्यु हो जायेगी।"

इस शाप से पाण्डु अत्यन्त दुःखी हुये और अपनी रानियों से बोले, "हे देवियों! अब मैं अपनी समस्त वासनाओं का त्याग कर के इस वन में ही रहूँगा तुम लोग हस्तिनापुर लौट जाओ़" उनके वचनों को सुन कर दोनों रानियों ने दुःखी होकर कहा, "नाथ! हम आपके बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकतीं। आप हमें भी वन में अपने साथ रखने की कृपा कीजिये।" पाण्डु ने उनके अनुरोध को स्वीकार कर के उन्हें वन में अपने साथ रहने की अनुमति दे दी।

इसी दौरान राजा पाण्डु ने अमावस्या के दिन ऋषि-मुनियों को ब्रह्मा जी के दर्शनों के लिये जाते हुये देखा। उन्होंने उन ऋषि-मुनियों से स्वयं को साथ ले जाने का आग्रह किया। उनके इस आग्रह पर ऋषि-मुनियों ने कहा, "राजन्! कोई भी निःसन्तान पुरुष ब्रह्मलोक जाने का अधिकारी नहीं हो सकता अतः हम आपको अपने साथ ले जाने में असमर्थ हैं।"

ऋषि-मुनियों की बात सुन कर पाण्डु अपनी पत्नी से बोले, "हे कुन्ती! मेरा जन्म लेना ही वृथा हो रहा है क्योंकि सन्तानहीन व्यक्ति पितृ-ऋण, ऋषि-ऋण, देव-ऋण तथा मनुष्य-ऋण से मुक्ति नहीं पा सकता क्या तुम पुत्र प्राप्ति के लिये मेरी सहायता कर सकती हो?" कुन्ती बोली, "हे आर्यपुत्र! दुर्वासा ऋषि ने मुझे ऐसा मन्त्र प्रदान किया है जिससे मैं किसी भी देवता का आह्वान करके मनोवांछित वस्तु प्राप्त कर सकती हूँ। आप आज्ञा करें मैं किस देवता को बुलाऊँ।" इस पर पाण्डु ने धर्म को आमन्त्रित करने का आदेश दिया। धर्म ने कुन्ती को पुत्र प्रदान किया जिसका नाम युधिष्ठिर रखा गया। कालान्तर में पाण्डु ने कुन्ती को पुनः दो बार वायुदेव तथा इन्द्रदेव को आमन्त्रित करने की आज्ञा दी। वायुदेव से भीम तथा इन्द्र से अर्जुन की उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् पाण्डु की आज्ञा से कुन्ती ने माद्री को उस मन्त्र की दीक्षा दी। माद्री ने अश्वनीकुमारों को आमन्त्रित किया और नकुल तथा सहदेव का जन्म हुआ।

एक दिन राजा पाण्डु माद्री के साथ वन में सरिता के तट पर भ्रमण कर रहे थे। वातावरण अत्यन्त रमणीक था और शीतल-मन्द-सुगन्धित वायु चल रही थी। सहसा वायु के झोंके से माद्री का वस्त्र उड़ गया। इससे पाण्डु का मन चंचल हो उठा और वे मैथुन मे प्रवृत हुये ही थे कि शापवश उनकी मृत्यु हो गई। माद्री उनके साथ सती हो गई किन्तु पुत्रों के पालन-पोषण के लिये कुन्ती हस्तिनापुर लौट आई।

4. कर्ण के जन्म की कथा :

कर्ण का जन्म कुन्ती को मिले एक वरदान स्वरुप हुआ था। जब वह कुँआरी थी, तब एक बार दुर्वासा ऋषि उसके पिता के महल में पधारे। तब कुन्ती ने पूरे एक वर्ष तक ऋषि की बहुत अच्छे से सेवा की। कुन्ती के सेवाभाव से प्रसन्न होकर उन्होनें अपनी दिव्यदृष्टि से ये देख लिया कि पाण्डु से उसे सन्तान नहीं हो सकती और उसे ये वरदान दिया कि वह किसी भी देवता का स्मरण करके उनसे सन्तान उत्पन्न कर सकती है। एक दिन उत्सुकतावश कुँआरेपन में ही कुन्ती ने सूर्य देव का ध्यान किया। इससे सूर्य देव प्रकट हुए और उसे एक पुत्र दिया जो तेज़ में सूर्य के ही समान था, और वह कवच और कुण्डल लेकर उत्पन्न हुआ था जो जन्म से ही उसके शरीर से चिपके हुए थे। चूंकि वह अभी भी अविवाहित थी इसलिये लोक-लाज के डर से उसने उस पुत्र को एक बक्से में रख कर गंगाजी में बहा दिया।

5. राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुधन के जन्म की कथा :

दशरथ अधेड़ उम्र तक पहुँच गये थे लेकिन उनका वंश सम्हालने के लिए उनका पुत्र रूपी कोई वंशज नहीं था। उन्होंने पुत्र कामना के लिए अश्वमेध यज्ञ तथा पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराने का विचार किया। उनके एक मंत्री सुमन्त्र ने उन्हें सलाह दी कि वह यह यज्ञ अपने दामाद ऋष्यशृंग या साधारण की बोलचाल में शृंगि ऋषि से करवायें। दशरथ के कुल गुरु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ थे। वह उनके धर्म गुरु भी थे तथा धार्मिक मंत्री भी। उनके सारे धार्मिक अनुष्ठानों की अध्यक्षता करने का अधिकार केवल धर्म गुरु को ही था। अतः वशिष्ठ की आज्ञा लेकर दशरथ ने शृंगि ऋषि को यज्ञ की अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया।
शृंगि ऋषि ने दोनों यज्ञ भलि भांति पूर्ण करवाये तथा पुत्रकामेष्टि यज्ञ के दौरान यज्ञ वेदि से एक आलौकिक यज्ञ पुरुष या प्रजापत्य पुरुष उत्पन्न हुआ तथा दशरथ को स्वर्णपात्र में नैवेद्य का प्रसाद प्रदान करके यह कहा कि अपनी पत्नियों को यह प्रसाद खिला कर वह पुत्र प्राप्ति कर सकते हैं। दशरथ इस बात से अति प्रसन्न हुये और उन्होंने अपनी पट्टरानी कौशल्या को उस प्रसाद का आधा भाग खिला दिया। बचे हुये भाग का आधा भाग (एक चौथाई) दशरथ ने अपनी दूसरी रानी सुमित्रा को दिया। उसके बचे हुये भाग का आधा हिस्सा (एक बटा आठवाँ) उन्होंने कैकेयी को दिया। कुछ सोचकर उन्होंने बचा हुआ आठवाँ भाग भी सुमित्रा को दे दिया। सुमित्रा ने पहला भाग भी यह जानकर नहीं खाया था कि जब तक राजा दशरथ कैकेयी को उसका हिस्सा नहीं दे देते तब तक वह अपना हिस्सा नहीं खायेगी। अब कैकेयी ने अपना हिस्सा पहले खा लिया और तत्पश्चात् सुमित्रा ने अपना हिस्सा खाया। इसी कारण राम (कौशल्या से), भरत (कैकेयी से) तथा लक्ष्मण व शत्रुघ्न (सुमित्रा से) का जन्म हुआ। 

6. पवन पुत्र हनुमान के जन्म कि कथा : 

पुराणों की कथानुसार हनुमान की माता अंजना संतान सुख से वंचित थी। कई जतन करने के बाद भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी। इस दुःख से पीड़ित अंजना मतंग ऋषि के पास गईं, तब मंतग ऋषि ने उनसे कहा-पप्पा सरोवर के पूर्व में एक नरसिंहा आश्रम है, उसकी दक्षिण दिशा में नारायण पर्वत पर स्वामी तीर्थ है वहां जाकर उसमें स्नान करके, बारह वर्ष तक तप एवं उपवास करना पड़ेगा तब जाकर तुम्हें पुत्र सुख की प्राप्ति होगी।

अंजना ने मतंग ऋषि एवं अपने पति केसरी से आज्ञा लेकर तप किया था बारह वर्ष तक केवल वायु का ही भक्षण किया तब वायु देवता ने अंजना की तपस्या से खुश होकर उसे वरदान दिया जिसके परिणामस्वरूप चैत्र शुक्ल की पूर्णिमा को अंजना को पुत्र की प्राप्ति हुई। वायु के द्वारा उत्पन्न इस पुत्र को ऋषियों ने वायु पुत्र नाम दिया।

7. हनुमान पुत्र मकरध्वज के ज़न्म की कथा :

हनुमान वैसे तो ब्रह्मचारी थे फिर भी वो एक पुत्र के पिता बने थे हालांकि यह पुत्र वीर्य कि जगाह पसीनें कि बूंद से हुआ था। कथा कुछ इस प्रकार है जब हनुमानजी सीता की खोज में लंका पहुंचे और मेघनाद द्वारा पकड़े जाने पर उन्हें रावण के दरबार में प्रस्तुत किया गया। तब रावण ने उनकी पूंछ में आग लगवा दी थी और हनुमान ने जलती हुई पूंछ से लंका जला दी। जलती हुई पूंछ की वजह से हनुमानजी को तीव्र वेदना हो रही थी जिसे शांत करने के लिए वे समुद्र के जल से अपनी पूंछ की अग्नि को शांत करने पहुंचे। उस समय उनके पसीने की एक बूंद पानी में टपकी जिसे एक मछली ने पी लिया था। उसी पसीने की बूंद से वह मछली गर्भवती हो गई और उससे उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। जिसका नाम पड़ा मकरध्वज। मकरध्वज भी हनुमानजी के समान ही महान पराक्रमी और तेजस्वी था उसे अहिरावण द्वारा पाताल लोक का द्वार पाल नियुक्त किया गया था। जब अहिरावण श्रीराम और लक्ष्मण को देवी के समक्ष बलि चढ़ाने के लिए अपनी माया के बल पर पाताल ले आया था तब श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराने के लिए हनुमान पाताल लोक पहुंचे और वहां उनकी भेंट मकरध्वज से हुई। तत्पश्चात मकरध्वज ने अपनी उत्पत्ति की कथा हनुमान को सुनाई। हनुमानजी ने अहिरावण का वध कर प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को मुक्त कराया और मकरध्वज को पाताल लोक का अधिपति नियुक्त करते हुए उसे धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।

8. द्रोणाचार्य के जन्म की कथा : 

द्रोणाचार्य कौरव व पाण्डव राजकुमारों के गुरु थे। द्रोणाचार्य का जन्म कैसे हुआ इसका वर्णन महाभारत के आदि पर्व में मिलता है- एक समय गंगा द्वार नामक स्थान पर महर्षि भरद्वाज रहा करते थे। वे बड़े व्रतशील व यशस्वी थे। एक दिन वे महर्षियों को साथ लेकर गंगा स्नान करने गए। वहां उन्होंने देखा कि घृताची नामक अप्सरा स्नान करके जल से निकल रही है। उसे देखकर उनके मन में काम वासना जाग उठी और उनका वीर्य स्खलित होने लगा। तब उन्होंने उस वीर्य को द्रोण नामक यज्ञ पात्र (यज्ञ के लिए उपयोग किया जाने वाला एक प्रकार का बर्तन) में रख दिया। उसी से द्रोणाचार्य का जन्म हुआ। द्रोण ने सारे वेदों का अध्ययन किया। महर्षि भरद्वाज ने पहले ही आग्नेयास्त्र की शिक्षा अग्निवेश्य को दे दी थी। अपने गुरु भरद्वाज की आज्ञा से अग्निवेश्य ने द्रोणाचार्य को आग्नेयास्त्र की शिक्षा दी। द्रोणाचार्य का विवाह शरद्वान की पुत्री कृपी से हुआ था।


9. ऋषि ऋष्यश्रृंग के जन्म की कथा : 

ऋषि ऋष्यश्रृंग महात्मा काश्यप (विभाण्डक) के पुत्र थे। महात्मा काश्यप बहुत ही प्रतापी ऋषि थे। उनका वीर्य अमोघ था और तपस्या के कारण अन्त:करण शुद्ध हो गया था। एक बार वे सरोवर में पर स्नान करने गए। वहां उर्वशी अप्सरा को देखकर जल में ही उनका वीर्य स्खलित हो गया। उस वीर्य को जल के साथ एक हिरणी ने पी लिया, जिससे उसे गर्भ रह गया। वास्तव में वह हिरणी एक देवकन्या थी। किसी कारण से ब्रह्माजी उसे श्राप दिया था कि तू हिरण जाति में जन्म लेकर एक मुनि पुत्र को जन्म देगी, तब श्राप से मुक्त हो जाएगी।

इसी श्राप के कारण महामुनि ऋष्यश्रृंग उस मृगी के पुत्र हुए। वे बड़े तपोनिष्ठ थे। उनके सिर पर एक सींग था, इसीलिए उनका नाम ऋष्यश्रृंग प्रसिद्ध हुआ। वाल्मीकि रामायण के अनुसार राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाया था। इस यज्ञ को मुख्य रूप से ऋषि ऋष्यश्रृंग ने संपन्न किया था। इस यज्ञ के फलस्वरूप ही भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत व शत्रुघ्न का जन्म हुआ था।

10. कृपाचार्य व कृपी के जन्म की कथा : 

कृपाचार्य महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक थे। उनके जन्म के संबंध में पूरा वर्णन महाभारत के आदि पर्व में मिलता है। उसके अनुसार- महर्षि गौतम के पुत्र थे शरद्वान। वे बाणों के साथ ही पैदा हुए थे। उनका मन धनुर्वेद में जितना लगता था, उतना पढ़ाई में नहीं लगता था। उन्होंने तपस्या करके सारे अस्त्र-शस्त्र प्राप्त किए। शरद्वान की घोर तपस्या और धनुर्वेद में निपुणता देखकर देवराज इंद्र बहुत भयभीत हो गए। उन्होंने शरद्वान की तपस्या में विघ्न डालने के लिए जानपदी नाम की देवकन्या भेजी। वह शरद्वान के आश्रम में आकर उन्हें लुभाने लगी। उस सुंदरी को देखकर शरद्वान के हाथों से धनुष-बाण गिर गए। वे बड़े संयमी थे तो उन्होंने स्वयं को रोक लिया, लेकिन उनके मन में विकार आ गया था। इसलिए अनजाने में ही उनका शुक्रपात हो गया। वे धनुष, बाण, आश्रम और उस सुंदरी को छोड़कर तुरंत वहां से चल गए।

​उनका वीर्य सरकंडों पर गिरा था, इसलिए वह दो भागों में बंट गया। उससे एक कन्या और एक पुत्र की उत्पत्ति हुई। उसी समय संयोग से राजा शांतनु वहां से गुजरे। उनकी नजर उस बालक व बालिका पर पड़ी। शांतनु ने उन्हें उठा लिया और अपने साथ ले आए। बालक का नाम रखा कृप और बालिका नाम रखा कृपी। जब शरद्वान को यह बात मालूम हुई तो वे राजा शांतनु के पास आए और उन बच्चों के नाम, गोत्र आदि बतलाकर चारों प्रकार के धनुर्वेदों, विविध शास्त्रों और उनके रहस्यों की शिक्षा दी। थोड़े ही दिनों में कृप सभी विषयों में पारंगत हो गए। कृपाचार्य की योग्यता देखते हुए उन्हें कुरुवंश का कुलगुरु नियुक्त किया गया।

11. द्रौपदी व धृष्टद्युम्न के जन्म की कथा : 

द्रोणाचार्य और द्रुपद बचपन के मित्र थे। राजा बनने के बाद द्रुपद को अंहकार हो गया। जब द्रोणाचार्य राजा द्रुपद को अपना मित्र समझकर उनसे मिलने गए तो द्रुपद ने उनका बहुत अपमान किया। बाद में द्रोणाचार्य ने पाण्डवों के माध्यम से द्रुपद को पराजित कर अपने अपमान का बदला लिया। राजा द्रुपद अपनी पराजय का बदला लेना चाहते थे था इसलिए उन्होंने ऐसा यज्ञ करने का निर्णय लिया, जिसमें से द्रोणाचार्य का वध करने वाला वीर पुत्र उत्पन्न हो सके। राजा द्रुपद इस यज्ञ को करवाले के लिए कई विद्वान ऋषियों के पास गए, लेकिन किसी ने भी उनकी इच्छा पूरी नहीं की।

अंत में महात्मा याज ने द्रुपद का यज्ञ करवा स्वीकार कर लिया। महात्मा याज ने जब राजा द्रुपद का यज्ञ करवाया तो यज्ञ के अग्निकुण्ड में से एक दिव्य कुमार प्रकट हुआ। इसके बाद उस अग्निकुंड में से एक दिव्य कन्या भी प्रकट हुई। वह अत्यंत ही सुंदर थी। ब्राह्मणों ने उन दोनों का नामकरण किया। वे बोले- यह कुमार बड़ा धृष्ट(ढीट) और असहिष्णु है। इसकी उत्पत्ति अग्निकुंड से हुई है, इसलिए इसका धृष्टद्युम्न होगा। यह कुमारी कृष्ण वर्ण की है इसलिए इसका नाम कृष्णा होगा। द्रुपद की पुत्री होने के कारण कृष्णा ही द्रौपदी के नाम से विख्यात हुई।

12. राधा के जन्म की कथा : 

ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार एक बार गोलोक में किसी बात पर राधा और श्रीदामा नामक गोप में विवाद हो गया। इस पर श्रीराधा ने उस गोप को असुर योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया। तब उस गोप ने भी श्रीराधा को यह श्राप दिया कि आपको भी मानव योनि में जन्म लेना पड़ेगा। वहां गोकुल में श्रीहरि के ही अंश महायोगी रायाण नामक एक वैश्य होंगे। आपका छाया रूप उनके साथ रहेगा। भूतल पर लोग आपको रायाण की पत्नी ही समझेंगे, श्रीहरि के साथ कुछ समय आपका विछोह रहेगा।

ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार जब भगवान श्रीकृष्ण के अवतार का समय आया तो उन्होंने राधा से कहा कि तुम शीघ्र ही वृषभानु के घर जन्म लो। श्रीकृष्ण के कहने पर ही राधा व्रज में वृषभानु वैश्य की कन्या हुईं। राधा देवी अयोनिजा थीं, माता के गर्भ से उत्पन्न नहीं हुई। उनकी माता ने गर्भ में वायु को धारण कर रखा था। उन्होंने योगमाया की प्रेरणा से वायु को ही जन्म दिया परंतु वहां स्वेच्छा से श्रीराधा प्रकट हो गईं।

13. राजा सगर के साठ हजार पुत्रों के जन्म की कथा :

रामायण के अनुसार इक्ष्वाकु वंश में सगर नामक प्रसिद्ध राजा हुए। उनकी दो रानियां थीं- केशिनी और सुमति। दीर्घकाल तक संतान जन्म न होने पर राजा अपनी दोनों रानियों के साथ हिमालय पर्वत पर जाकर पुत्र कामना से तपस्या करने लगे। तब महर्षि भृगु ने उन्हें वरदान दिया कि एक रानी को साठ हजार अभिमानी पुत्र प्राप्त तथा दूसरी से एक वंशधर पुत्र होगा।

कालांतर में सुमति ने तूंबी के आकार के एक गर्भ-पिंड को जन्म दिया। राजा उसे फेंक देना चाहते थे किंतु तभी आकाशवाणी हुई कि इस तूंबी में साठ हजार बीज हैं। घी से भरे एक-एक मटके में एक-एक बीज सुरक्षित रखने पर कालांतर में साठ हजार पुत्र प्राप्त होंगे। इसे महादेव का विधान मानकर सगर ने उन्हें वैसे ही सुरक्षित रखा। समय आने पर उन मटकों से साठ हजार पुत्र उत्पन्न हुए। जब राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया तो उन्होंने अपने साठ हजार पुत्रों को उस घोड़े की सुरक्षा में नियुक्त किया।

देवराज इंद्र ने उस घोड़े को छलपूर्वक चुराकर कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। राजा सगर के साठ हजार पुत्र उस घोड़े को ढूंढते-ढूंढते जब कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे तो उन्हें लगा कि मुनि ने ही यज्ञ का घोड़ा चुराया है। यह सोचकर उन्होंने कपिल मुनि का अपमान कर दिया। ध्यानमग्न कपिल मुनि ने जैसे ही अपनी आंखें खोली राजा सगर के 60 हजार पुत्र वहीं भस्म हो गए।

14. जनक नंदिनी सीता के जन्म की कहानी : 

भगवान श्रीराम की पत्नी सीता का जन्म भी माता के गर्भ से नहीं हुआ था। रामायण के अनुसार उनका जन्म भूमि से हुआ था। वाल्मीकि रामायण के बाल काण्ड में राजा जनक महर्षि विश्वामित्र से कहते हैं कि-

अथ मे कृषत: क्षेत्रं लांगलादुत्थिता तत:।
क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता।
भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा।

अर्थात्- एक दिन मैं यज्ञ के लिए भूमि शोधन करते समय खेत में हल चला रहा था। उसी समय हल के अग्र भाग से जोती गई भूमि से एक कन्या प्रकट हुई। सीता (हल द्वारा खींची गई रेखा) से उत्पन्न होने के कारण उसका नाम सीता रखा गया। पृथ्वी से प्रकट हुई वह मेरी कन्या क्रमश: बढ़कर सयानी हुई।


15. मनु व शतरूपा के जन्म की कहानी : 

धर्म ग्रंथों के अनुसार मनु व शतरूपा सृष्टि के प्रथम मानव माने जाते हैं। इन्हीं से मानव जाति का आरंभ हुआ। मनु का जन्म भगवान ब्रह्मा के मन से हुआ माना जाता है। मनु का उल्लेख ऋग्वेद काल से ही मानव सृष्टि के आदि प्रवर्तक और समस्त मानव जाति के आदि पिता के रूप में किया जाता रहा है। इन्हें 'आदि पुरूष' भी कहा गया है। वैदिक संहिताओं में भी मनु को ऐतिहासिक व्यक्ति माना गया है। ये सर्वप्रथम मानव थे जो मानव जाति के पिता तथा सभी क्षेत्रों में मानव जाति के पथ प्रदर्शक स्वीकृत हैं। मनु का विवाह ब्रह्मा के दाहिने भाग से उत्पन्न शतरूपा से हुआ था।

मनु एक धर्म शास्त्रकार भी थे। धर्मग्रंथों के बाद धर्माचरण की शिक्षा देने के लिये आदिपुरुष स्वयंभुव मनु ने स्मृति की रचना की जो मनुस्मृति के नाम से विख्यात है। उत्तानपाद जिसके घर में ध्रुव पैदा हुआ था, इन्हीं का पुत्र था। मनु स्वायंभुव का ज्येष्ठ पुत्र प्रियव्रत पृथ्वी का प्रथम क्षत्रिय माना जाता है। इनके द्वारा प्रणीत 'स्वायंभुव शास्त्र' के अनुसार पिता की संपत्ति में पुत्र और पुत्री का समान अधिकार है। इनको धर्मशास्त्र का और प्राचेतस मनु अर्थशास्त्र का आचार्य माना जाता है। मनुस्मृति ने सनातन धर्म को आचार संहिता से जोड़ा था।

16. राजा पृथु के जन्म की कथा :

पृथु एक सूर्यवंशी राजा थे, जो वेन के पुत्र थे। स्वयंभुव मनु के वंशज राजा अंग का विवाह सुनिथा नामक स्त्री से हुआ था। वेन उनका पुत्र हुआ। वह पूरी धरती का एकमात्र राजा था। सिंहासन पर बैठते ही उसने यज्ञ-कर्मादि बंद कर दिये। तब ऋषियों ने मंत्रपूत कुशों से उसे मार डाला, लेकिन सुनिथा ने अपने पुत्र का शव संभाल कर रखा। राजा के अभाव में पृथ्वी पर पाप कर्म बढऩे लगे। तब ब्राह्मणों ने मृत राजा वेन की भुजाओं का मंथन किया, जिसके फलस्वरूप स्त्री-पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ। पुरुष का नाम पृथु तथा स्त्री का नाम अर्चि हुआ। अर्चि पृथु की पत्नी हुई। पृथु पूरी धरती के एकमात्र राजा हुए। पृथु ने ही उबड़-खाबड़ धरती को जोतने योग्य बनाया। नदियों, पर्वतों, झरनों आदि का निर्माण किया। राजा पृथु के नाम से ही इस धरा का नाम पृथ्वी पड़ा।

रविवार, 8 मार्च 2015

घरेलू उपचार से करें मुहासे गायब

प्रदूषित धुआं, धूल के कण, सिर में डेंड्रफ, रक्त में अशुद्धि, तेलीय त्वचा जैसी समस्याओं के चलते अक्सर चेहरों पर मुहांसे निकल आते हैं। सही समय पर इनका उपचार नही होने से यह समस्या विकराल रूप भी धारण कर लेती है।
घरेलू उपचार
  • लहसुन की कुछ कलियों को कुचलकर, इसे एक चम्मच दही और आधा चम्मच शहद मिलाकर मुहांसों पर आहिस्ता-आहिस्ता इस लेप को लगाना चाहिए। करीब 15 मिनट बाद चेहरे को साफ पानी से धुल लेना चाहिए। ऐसा करने से मुहांसे शीघ्र खत्म हो जाते हैं। माना जाता है कि महज 2 लहसून की कलियों को कुचलकर प्रतिदिन मुहांसों पर लगाया जाए तो भी काफी फायदा होता है।
  • चेहरे पर हल्दी का चूर्ण और नीम की पत्तियों का रस मिलाकर लगाया जाए तो मुहांसे खत्म होने लगते हैं। दही, हल्दी और लौंग का चूर्ण आपस में मिलाकर मुहांसों पर लगाया जाए तो राहत मिलती है।
  • हिमाचल में महिलाएं पारंपरिक ज्ञान के अनुसार सेव के फलों को कुचलकर रस तैयार करती हैं और इस रस को मुहांसों और चेहरे के अन्य दाग धब्बों वाले हिस्सों पर लगाती हैं, ऐसा करने से मुहांसों में आराम मिलता है और त्वचा के पुराने दाग-धब्बे भी समाप्त हो जाते हैं।
  • चंदन, हल्दी और गुलाब जल का मिश्रण तैयार कर फेसपैक तैयार किया जाए और सप्ताह में कम से कम एक बार रात को 15 मिनट के लिए इसे लगाकर रखा जाए तो मुहांसे होने की गुंजाईश काफी हद तक कम हो जाती है। यदि चेहरे पर मुहांसे हों तो वो भी खत्म हो जाते हैं।
  • जानकारों के अनुसार उन महिलाओं को ज्यादा मुहांसे होते हैं जिनके चेहरे की त्वचा तेलीय होती है। तेलीय त्वचा पर धूल और मिट्टी के कण अक्सर चिपक जाते हैं या सिर से झडऩे वाले डेंड्रफ इस तेल की वजह से चेहरे पर चिपक जाते हैं और फिर सूक्ष्मजीवी संक्रमण से मुहांसे बन जाते हैं।
  • हर्बल नुस्खों से मिटाएं चेहरे के दाग-धब्बे
  • सामान्यत: मुहांसों के होने के बाद या चेहरे पर आईं खरोचों के बाद इनके निशान चेहरे से दूर नहीं होते हैं, ऐसे निशानों को दूर करने के लिए इन पारंपरिक हर्बल नुस्खों को अपनाया जा सकता है।
  • पान के एक पत्ते को कुचल लिया जाए और इसमें एक चम्मच नारियल का तेल मिला लिया जाए। इसे चेहरे या शरीर के किसी भी हिस्से पर बने दाग, काले निशान या धब्बों पर लगाकर कुछ देर रखा जाए और फिर धो लिया जाए। ऐसा सप्ताह में कम से कम 2 से 3 बार किया जाए तो 3 महीने के भीतर निशान मिट सकते हैं।
  • एक आलू को बारीक पीस लिया जाए और इसमें 2-3 चम्मच कच्चा दूध मिला लिया जाए ताकि पेस्ट तैयार हो जाए। इस पेस्ट को प्रतिदिन सुबह शाम कुछ देर के लिए काले निशानों पर लगाकर रखा जाए और फिर धो लिया जाए, शीघ्र ही निशान दूर हो जाएंगे।
  • प्रतिदिन ग्लिसरीन और नींबू रस की समान मात्रा चेहरे के काले धब्बों पर लेपित की जाए तो जबरदस्त फायदा होता है और जल्द ही गहरे काले निशानों की छुट्टी हो जाती है।
चेहरे की झुर्रियां
  • कम उम्र में चेहरे पर झुर्रियां बनने की कई वजहें हो सकती है लेकिन कुछ पारंपरिक हर्बल नुस्खों को अपनाकर इस समस्या से काफी हद तक छुटकारा मिल सकता है।
  • सेव को कुचल लिया जाए और इसमें कुछ मात्रा कच्चे दूध की मिला ली जाए और चेहरे पर लगाया जाए। जब यह सूख जाए तो इसे धो लिया जाना चाहिए। सप्ताह में कम से कम 4 बार ऐसा करने से काफी फायदा होता है।
  • दो टमाटर को लेकर कुचला जाए और इसमें 3 चम्मच दही और दो चम्मच जौ का आटा मिला दिया जाए। चेहरे पर इस मिश्रण को कम से कम 20 मिनट के लिए लगाकर रखा जाए तो यह त्वचा क ी सिकुडऩ में मदद करता है जिससे झुर्रियां कम होने लगती हैं। इस उपाय को सप्ताह में 2 बार कम से कम 1 माह तक उपयोग में लाना चाहिए, फायदा होता है।
  • रात में सोने जाने से पहले संतरे के 2 चम्मच रस में 2 चम्मच शहद मिलाकर चेहरे पर 20 मिनिट तक लगाए रखना चाहिए, बाद में साफ कपास को दूध में डुबोकर चेहरे की सफाई करनी चाहिए, ऐसा प्रतिदिन करा जाए तो सकारात्मक परिणाम जल्द ही दिखने लगते हैं।
  • हर्बल वैद्यों की जानकारी के अनुसार 1/2 कप पत्ता गोभी का रस तैयार किया जाए और इसमें 1/2 चम्मच दही और 1 चम्मच शहद मिलाकर चेहरे पर लगाया जाए। जब यह सूख जाए तो गुनगुने पानी से इसे धो लिया जाए, ऐसा करने से चेहरे की त्वचा में प्राकृतिक रूप से खिंचाव आता है और यह झुर्रियों को दूर करने में मदद करता है।
  • चावल के आटे में थोड़ा सा दूध और गुलाब जल मिलाकर पेस्ट तैयार कर लिया जाए और चेहरे पर हल्का-हल्का मालिश किया जाए। कुछ देर बाद इसे गुनगुने पानी से साफ भी कर लिया जाए। सप्ताह में कम से कम 3 बार इस प्रक्रिया को दोहराने से काफी फर्क महसूस किया जा सकता है।
डार्क सर्कल्स का बनना
  • तनावग्रस्त जीवन और अनिद्रा की वजह से अक्सर आंखों के इर्द-गिर्द डार्क सर्कल्स का बन जाना आम बात है लेकिन कुछ हर्बल नुस्खों के उपयोग से इस समस्या से भी छुटकारा पाया जा सकता है।
  • ककड़ी के गोल-गोल टुकड़े काट लिए जाएं और इन्हें रेफ्रिजरेटर में रख दिया जाए। जब ये ठंडे हो जाएं तो इन्हें आंखो के ऊपर 15 मिनिट तक रख दिया जाए। बाद में इन टुकड़ों को डार्क सर्कल वाले हिस्सों पर आहिस्ता-आहिस्ता रगड़ दिया जाए और अंत में साफ पानी से चेहरा धो लिया जाए। प्रतिदिन एक बार ऐसा करने से जल्द ही डार्क सर्कल्स से छुटकारा मिल जाता है।
  • कच्चे आलू के गोल-गोल टुकड़ों को 15 से 20 मिनिट तक आंखों के ऊपर रख दिया जाए और बाद में ठंडे पानी से धो लिया जाए, फायदा करता है।
  • टमाटर के 1 चम्मच रस के साथ 1 चम्मच नींबू रस मिलाया जाए और डार्क सर्कल्स वाले हिस्सों पर लेपित कर दिया जाए, करीब 15 से 25 मिनिट के बाद इसे साफ पानी से धो लिया जाए। ऐसा प्रतिदिन रात सोने से पहले से किया जाए तो शीघ्र ही डार्क सर्कल्स छू मंतर हो सकते हैं।

सोच समझकर करें अलग होने का फैसला




* अलग होने का फैसला सोच समझकर लें।

* इसके नतीजों पर गौर करना ना भूलें।

* अलग होने से पहले साथी से बात जरूर करें।

* बच्चों को इसके बारे में जरूर बताएं।


रिश्ता कोई भी हो, थोडा-बहुत मनमुटाव होना बड़ी बात नही है लेकिन जब यही मनमुटाव

बढ़ जाए तो रिश्तों को खोखला कर देती है। पति-पत्नी का रिश्ता प्यार और तकरार से

मिलकर ही बनता है लेकिन जब रिश्ते से प्यार की जगह तकरार ले तो समझिए आप दोनों के

बीच का प्यार कहीं खो गया है।

किसी सम्बन्ध को समाप्त करने का फैसला करना न केवल बेहद कठिन है बल्कि चिन्ताएं,

व्या‍कुलता, अलग होने का अहसास और पछतावा आदि अनेकों भावनाओं के अहसास इससे जुड़े हैं।

वैवाहिक जीवन का अंत करना न केवल इसलिए कठिन होता है कि कानूनी कार्यवाहियां आपको

मानसिक रुप से काफी परेशान कर देती है। इससे निबटना और भी जटिल होता है।

अलग होने का फैसला लेना बहुत आसान है लेकिन जल्दबाज़ी में यह निर्णय लेना आप दोनों के लिए

ही ठीर नहीं। अलग होने से पहले इस बारे में अच्छी तरह सोच-विचार कर लीजिए। यह ज़रूरी

नहीं कि अलग होने से आपकी ज़िंदगी में छाए परेशानी के काले बादल छट जाएगे। इसके उलट

अकसर यह देखा गया है कि अलग होने से एक समस्या तो हल हो जाती है, लेकिन उसकी जगह

एक नयी समस्या खड़ी हो जाती है। जो पति-पत्नी रोज की लड़ाई-झगड़ों से तंग आकर अलग

होने का फैसला करते हैं वे सोचते हैं कि इससे उनकी सारी समस्याओं का हल हो जाएगा। लेकिन

यह इतना आसान नहीं है। इसलिए यह जानना ज़रूरी है कि अलग होने या तलाक लेने के

क्या-क्या नतीजे हो सकते हैं और उन्हें ध्यान में रखकर फैसला लेना।


कैसे लें अलग होने का फैसला

break up



साथी से चर्चा करें
किसी सम्बन्ध को समाप्त करना पारस्परिक निर्णय होना चाहिए और आपस में मिल बैठकर बात

कर लेनी चाहिए ताकि किसी प्रकार की गहतफहमी न रहे। हो सकता है कि दोनों के बीच

संवाद का तार टूट चुका हो लेकिन फिर भी कुछ महत्व पूर्ण मसलों पर चर्चा करना फिर भी

ज़रूरी है। यह विचार-विमर्श शांतिपूर्वक और निर्णायक रूप में करें।



दोषारोपण से बचें
इस बारे में कोई फैसला देने से बचें कि किसकी गलती ने सम्बन्ध को खराब कर दिया। चाहे

आपको लगता हो कि पूरी तरह से यह सामने वाले की गलती से ही हुआ है लेकिन अपनी इस राय

को जाहिर न करें। सम्बन्ध का समापन किसी दोषारोपण के साथ नहीं होना चाहिए क्योंरकि

इसमें दोनों की ही कुछ न कुछ भूमिका रही हो सकती है।



बच्चों को जानकारी दें

यदि आप शादीशुदा हैं और तलाक चाहते हैं तो, यदि आपके बच्चे हों, उन्हें अपने फैसले की

जानकारी ज़रूर दें कि क्या बदलाव होने वाला है। बच्चे संवेदनशील होते हैं और बड़ों के मामलों

को गहराई से नहीं समझ सकते लेकिन उनको मोटे तौर पर बताना ज़रूरी है कि क्या होने जा

रहा है।

result of breakup

अलग होने के नतीजे

वित्तीय समस्या
अलग होने से पहले वित्तीय मामलों के बारे में जरूर जानकारी लें क्योंकि अक्सर पत्नी को भयंकर

आर्थिक समस्या से जूझना पड़ता है। यह बात एक अध्ययन में भी सामने आयी जो यूरोप में सात

साल तक किया गया। उस अध्ययन में पता चला कि तलाक के बाद जहां पुरुषों की आमदनी में 11

प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, वहीं स्त्रियों की आमदनी 17 प्रतिशत घट गयी।


दोहरी भूमिका
जो तलाकशुदा माता-पिता अलग-अलग रहते हैं, उन्हें बच्चों की परवरिश करने के लिए दोहरी

भूमिका निभानी पड़ती है। बच्चों के लिए उन्हें उनके माता-पिता दोनों बनना पड़ता है। साथ

ही बच्चों की देखभाल कैसे की जाएगी और उन्हें अनुशासन कैसे दिया जाएगा। उनकी हर जरूरत

को समझना और पूरा करना।


अलग होने का आप पर असर

साथी से अलग होने के बाद एक इंसान कई तरह की भावनाओं से गुज़रता है। एक तरफ आप अपने

पूर्व साथी से अभी भी प्यार करते होंगे, क्योंकि बीते वक्‍त में आप दोनों ने एक साथ कई

प्यार भरे पल बिताए होगें। वहीं दूसरी तरफ आपको उस पर गुस्सा भी आता होगा।



अलग होने का बच्चों पर असर

लोग तलाक तो ले लेते हैं, पर अकसर यह नहीं सोचते कि इसका बच्चों पर क्या असर होगा।

बच्चे आपके इस फैसले को समझ नहीं पाते हैं उन्हें बस यह पता होता है कि उनके माता-पिता

अलग हो रहे हैं। बच्चों के लिए माता या पिता में से किसी एक को चुनना बहुत मुश्किल होता है।

पासपोर्ट बनाने के लिए महत्वपूर्ण जानकारी

पासपोर्ट सेवा
दृष्टिकोण
"व्यवस्थित कार्य प्रक्रिया तथा प्रतिबद्ध, प्रशिक्षित एवं अभिप्रेरित कर्मचारी बल
के माध्यम से नागरिको को समयबद्ध रूप में, पारदर्शी तरीके से, सुगमतापूर्वक,
विश्वसनीय तौर पर और आरामदायक वातावरण में पासपोर्ट सेवाएं प्रदान करना"
हाल के वर्षों में, भारत सरकार ने सार्वजनिक सेवाओं के वितरण में सुधार लाने के लिए ई शासन के युग में प्रवेश करने के लिए कई कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय ई-शासन योजना (एनईजीपी) मिशन मोड परियोजनाओं (एमएमपी) के रूप में पहचान की गई है जिसमें कई उच्च प्रभाव की ई-शासन परियोजनाएं शामिल हैं। ऐसी ही एक परियोजना भारत में पासपोर्ट सेवाओं में सुधार पर केंद्रित है।
विदेश मंत्रालय (एमईए) देश भर में 37 पासपोर्ट कार्यालयों और विदेश में 180 भारतीय दूतावासों और वाणिज्य दूतावास के एक नेटवर्क के माध्यम से भारतीय नागरिकों को पासपोर्ट जारी करने के लिए जिम्मेदार है।
शिक्षा, पर्यटन, तीर्थयात्रा, चिकित्सा उपस्थिति, व्यावसायिक उद्देश्यों और परिवार की यात्रा के लिए विदेश यात्रा करने के लिए पासपोर्ट एक आवश्यक यात्रा दस्तावेज है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान, बढती अर्थव्यवस्था और प्रसार वैश्वीकरण ने पासपोर्ट और संबंधित सेवाओं की मांग में वृद्धि करने में नेतृत्व किया है। पासपोर्ट की मांग प्रतिवर्ष लगभग 10% से बढ़ जाने का अनुमान है। पासपोर्ट और संबंधित सेवाओं के लिए इस बढ़ती मांग से व्यापक पहुंच और उपलब्धता बनाने के लिए, बड़े शहरों और छोटे कस्बों दोनों से आ रही है। बढ़ाने और भारतीय नागरिकों को पासपोर्ट सेवाओं के वितरण में सुधार करने के लिए विदेश मंत्रालय (एमईए) मई 2010 में पासपोर्ट सेवा प्रोजेक्ट (पीएसपी) का शुभारंभ किया है।
पीएसपी को सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) प्रणाली में शुरू किया गया है, जिसमे टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस सेवा प्रदान करती है | संप्रभु और प्रत्ययी कार्यों के अधिकार जैसे कि पासपोर्ट को प्रमाणित करना, प्रदान करना, जारी करना / निरस्तीकरण करना एमइए के पास सुरक्षित है | सामरिक नियंत्रण का स्वामित्व जिसमे डाटा/जानकारी भी निहित है, का अधिकार मंत्रालय के पास है।
पासपोर्ट से संबंधित सेवाओं के वितरण के लिए पासपोर्ट सेवा सरल, कुशल और पारदर्शी प्रक्रिया को अपनाती है। सरकारी अधिकारियों के लिए एक देशव्यापी नेटवर्क बनाने के अतिरिक्त, इसका उद्देश्य आवेदक के विवरणों की वास्तविकता के सत्यापन के लिए राज्य पुलिस के साथ और पासपोर्ट की डिलीवरी के लिए भारतीय डाक के साथ मिलकर कार्य करना भी है ।
भारत नागरिकों के लिए पासपोर्ट सेवा में बदलाव
पासपोर्ट सेवा परियोजना भारतीय नागरिकों के लिए एक सर्वोत्तम वर्ग का अनुभव प्रदान करने के लिए भारत में पासपोर्ट और उससे संबंधित सेवाओं को बदल रहा है। पीएसपी ने विदेश मंत्रालय को परिभाषित सेवा स्तर के भीतर, एक विश्वसनीय, सुविधाजनक और पारदर्शी तरीके से पासपोर्ट सेवाएं देने में सक्षम किया है। पीएसपी के द्वारा प्राप्त सेवा परिवर्तन के महत्वपूर्ण पहलू इस प्रकार हैं:
  1. कहीं पर भी किसी भी समय उपलब्धता : नागरिक अपने पासपोर्ट आवेदन जमा कर सकते हैं और अपनी सुविधानुसार पीएसपी पोर्टल (www.passportindia.gov.in) के माध्यम से मुलाक़ात का समय निर्धारित कर सकते हैं। सभी पासपोर्ट संबंधित सेवाओं की विस्तृत और नवीनतम जानकारी पोर्टल पर उपलब्ध होती है। नागरिक निर्धारित मुलाकात के दिन और समय पर पीएसके पर जाकर लंबी लाइनों और असुविधा से बच सकते हैं।
  2. नेटवर्क में वृद्धि : जैसे कि देश भर में पासपोर्ट सेवा के भाग के रूप में 37 पासपोर्ट कार्यालय, 77 पासपोर्ट सेवा केंद्र (पीएसके) और 16 पासपोर्ट सेवा लघु केन्द्र (पीएसएलके) स्थापित किए जा रहे हैं।
  3. बेहतर सुविधाएं : पीएसके एक विश्वस्तरीय वातावरण प्रदान करता है। प्रत्येक पीएसके में वातानुकूलित आरामदायक प्रतीक्षा कक्ष है, जिसमे सहायक गाइड, सूचना कियोस्क, फोटोकॉपी, खाद्य एवं पेय सुविधाएँ, सार्वजनिक फोन बूथ, शिशु देखभाल, समाचार पत्र एवं पत्रिकाएँ तथा टेलीविजन की सुविधा उपलब्ध है । इलेक्ट्रॉनिक कतार प्रबंधन प्रणाली 'पहले आएँ और पहले पाएँ' के सिद्धांत से आवेदन की प्रक्रिया को सुनिश्चित करती है।
  4. अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी संरचना : पासपोर्ट सेवा अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी संरचना द्वारा समर्थित है, जो दुनिया के सर्वोत्तम सुरक्षा उपायों के तुल्य सुरक्षित और सम्पूर्ण पासपोर्ट सेवाएं उपलब्ध कराता है । आवेदको का फोटोग्राफ और बायोमेट्रिक्स पीएसके आने पर लिया जाता हैं। उनके आवेदन और सहायक दस्तावेज़ डिजिटाइज़ किए जाते हैं और आगे प्रक्रिया के लिए सिस्टम में संग्रहित किए जाते हैं ।
  5. पुलिस और भारतीय डाक के साथ समन्वय : पीएसपी नेटवर्क सभी राज्यों और संघ शासित प्रदेशों को राज्य पुलिस से जोड़ता है। इलेक्ट्रॉनिक रूप से आवेदक का डाटा पुलिस के पास सत्यापन के लिए भेजा जाता है। पीसपी भारतीय डाक के लिए इंटरफेस भी प्रदान करता है, जिसके द्वारा नागरिकों को पासपोर्ट की डिलीवरी ट्रैक की जा सकती है|
  6. कॉल सेंटर और सहायता डेस्क : सप्ताह के सातों दिन और चौबीसों घंटे, 17 भारतीय भाषाओं में संचालित बहुभाषी कॉल सेंटर नागरिकों को पासपोर्ट सेवा से संबंधित जानकारी प्रदान करता है और उनके पासपोर्ट आवेदनों की प्रगति की जानकारी प्रदान करता है | ई मेल आधारित सहायता डेस्क भी पासपोर्ट संबंधित सेवाओं की जानकारी उपलब्ध कराता है ।

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पासपोर्ट के लिए ऑनलाइन आवेदन करें

ऑनलाइन आवेदन से लाभ

  • आवेदक क्षेत्रीय पोसपोर्ट कार्यालय में संबंधित अधिकारी के पास आवश्यक दस्तावेज़ और शुल्क जमा करने के लिए निश्चित तारीख और समय प्राप्त करने की सुविधा
  • पासपोर्ट आवेदन जमा करने के लिए लंबी पंक्ति में खड़े रहने की जरूरत नहीं।

पासपोर्ट के लिए ऑनलाइन आवेदन करने की पात्रता

  • पासपोर्ट प्राप्त करने के योग्य व्यक्तिऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं,
  • केवल संबंधित पासपोर्ट कार्यालय के अधिकारक्षेत्र के निवासी हीं वेबसाइट द्वारा ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं,
  • वर्तमान मेंपारपत्र के लिये ऑनलाइन आवेदन केवल इन शहरों के लिए उपलब्ध हैः
अहमदाबाद
अमृतसर
बैंगलोर
बरेली
भोपाल
भुवनेश्वर
चंडीगढ़
चेन्नई
कोचीन
कोयम्बटूर
देहरादून
दिल्ली
गाजियाबाद
गोवा
गुवाहाटी
हैदराबाद
जयपुर
जालंधर
जम्मू
कोलकाता
कोझीकोड
लखनऊ
मदुरई
मालपुरम्
मुम्बई
नागपुर
पटना
पुणे
रायपुर
राँची
शिमला
श्रीनगर
सूरत
थाणे
त्रिची
त्रिवेंद्रम
विशाखापत्तनम

पासपोर्ट के लिए ऑनलाइन आवेदन कब करें

  • जब नया पासपोर्ट प्राप्त करना हो (यदि आपने पहले कभी पोसपोर्ट नहीं लिया हो),
  • पासपोर्ट पुनः जारी करवाने के लिए (यदि आपके वर्तमान पोसपोर्ट की 10 वर्ष की वैधता समाप्त हो गई हो या अगले 12महीनों में समाप्त होने वाली हो)
  • डुप्लीकेट पासपोर्ट जारी करवाने के लिए (यदि आपका वर्तमान पासपोर्ट खो गया हो या क्षतिग्रस्त हो गया हो)

जरूरी दस्तावेज़

  • आवासीय पता का प्रमाण
  • जन्म तिथि का प्रमाण
  • अपेक्षित शुल्क (नकद या डीडी के रूप में)

ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया

  • आप पसपोर्ट कार्यालय के वेबसाइट -passportindia.gov.in के जरिये संबंधित पोसपोर्ट कार्यालय में अपना आवेदन पंजीकृत करा सकते है,
  • पंजीकरण के बाद सिस्टम आपसे अपने आवेदन पत्र को खोलनेसुरक्षित करने के लिए कहेगा,
  • आवेदन पत्र को खोलनेसुरक्षित करने के बाद आवेदन पत्र का प्रिंग ले लें,
  • यदि आप किसी कारणवश आवेदन पत्र का प्रिंट नहीं ले सकें हों तो आवेदन पत्र की संख्या अवश्य नोट कर लें। आवेदन पत्र की संख्या और जन्म तिथि की सहायता से आप बाद में भी आवेदन पत्र का प्रिंट ले सकते सकते हैं,
  • यदि आपने आवेदन को सुरक्षित कर लिया है तो भी आप आवेदन का प्रिंट ले लें,
  • ऑनलाइन आवेदन के बाद भी आवेदन पत्र में कुछ कॉलम खाली रह जाएंगे जिन्हें आपको हाथ से भरने होंगे,
  • भरे हुए आवेदन पत्र शुल्कजरूरी दस्तावेज जैसे जन्मतिथि प्रमाणपत्र आदि के साथ जमा करने के लिये नियत तारीख और समय पर पोसपोर्ट कार्यालय में जायें,
  • पोसपोर्ट कार्यालय में संबंधित अधिकारी से मिलने की तारीख और समय ऑनलाइन सिस्टम द्वारा सूचित किया जाएगा और आवेदन पत्र पर भी छपा होगा,
  • पोसपोर्ट कार्यालय में निर्धारित तारीख और समय पर जाएँ। आपको क्षेत्रीय पोसपोर्ट कार्यालय (आरपीओनियत समय से15 मिनट पहले पहुँच जाना चाहिये और निर्धारित काउंटर पर शुल्क आदि जमा करनी चाहिये,
  • आनलाइन आवेदकों को अपने आवेदन दाखिल करने के लिये टोकन नंबर लेने की आवश्यकता नहीं होती है। आपको अधिक देर तक कतार में प्रतीक्षा नहीं करनी होंगी।

पासपोर्ट के लिए शुल्क

पासपोर्ट के लिए निर्धारित शुल्क आवेदन पत्र के साथ संबंधित पोसपोर्ट अधिकारी के पक्ष में बैंक ड्राफ्ट द्वारा या नकद जमा करें। यदि आप बैंक ड्राफ्ट जमा कर रहे हों तो अपना पूरा नाम और आवेदन क्रमांक बैंक ड्राफ्ट के पीछे अवश्य लिखें। साथ हीआवेदन में जारीकर्त्ता बैंक का कोडबैंक ड्राफ्ट की संख्याउसके जारी करने की तारीख अवश्य लिखें। शुल्क भुगतान का विवरण आवेदन पत्र में संबद्ध खानों में दिया जाना चाहिये-
क्रम संख्या
विवरण
शुल्क
1.
10 वर्ष की वैधता वाली नयी पासपोर्ट (36 पृष्ठों वाली) (15 से 18 वर्ष के नाबालिगों सहित जो 10 वर्ष की पूर्ण वैधता वाली पासपोर्ट लेना चाहते हों)
1500 रुपये
2.
10 वर्ष की वैधता वाली पासपोर्ट (60 पृष्ठों वाली)
2000 रुपये
3.
नाबालिग (18 वर्ष से कमके लिये वर्ष की वैधता या नाबालिग के 18 वर्ष होने तकजो भी पहले होके लिए नया पासपोर्ट
1000 रुपये
4.
पासपोर्ट खो जानेक्षतिग्रस्त होने या चोरी हो जानेपर डुप्लीकेट पासपोर्ट (36 पृष्ठ)जारी कराने हेतु
3000 रुपये
5.
पासपोर्ट खो जानेक्षतिग्रस्त होने या चोरी हो जानेपर डुप्लीकेट पासपोर्ट (60 पृष्ठ)जारी कराने हेतु
3500 रुपये
6.
पुलिस का मंजूरी प्रमाणपत्रईसीएनआरअतिरिक्ति अनुमोदन
500 रुपये
7.
नामपताजन्मतिथिजन्म स्थानचेहरेपति या पत्नी के नाममाता-पिताकानूनी अभिभावक के नाम में परिवर्तन की स्थिति में
1500 रुपये [नई पासपोर्ट पुस्तिका जारी की जाएगा ]

तत्काल कोटा में पासपोर्ट के लिए शुल्क

तत्काल कोटे के अंतर्गत पासपोर्ट प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त शुल्क भुगतान का प्रावधान है। वह शुल्क नकद या संबंधित पासपोर्ट अधिकारी के पक्ष में बैक ड्राफ्ट के जमा की जानी चाहिए। तत्काल पासपोर्ट के लिए अतिरिक्त शुल्क का विवरण वेबसाइट से देखा जा सकता है कृपया पासपोर्टइंडिया की वेबसाइट जाएँ.

जरूरी दस्तावेज

नया पासपोर्ट प्राप्त करने के लिए आवेदन करते समय निम्न दस्तावेजों में से कोई दो अलग-अलग दस्तावेजों की छायाप्रति संलग्न करें:
१. आवासीय पता से संबंधित प्रमाण (निम्न में से को एक संलग्न करें):
  • आवेदक का राशन कार्ड,
  • प्रतिष्ठित कंपनियों के मालिक द्वारा लेटर हैड पर दिया गया प्रमाणपत्र,
  • पानी/ टेलीफोन/ बिजली का बिल,
  • चालू बैंक खाते का स्टेटमेंट,
  • आयकर ऐसेसमेंट आर्डर,
  • निर्वाचन आयोग द्वारा जारी वोटर आईडी कार्ड,
  • गैस कनेक्शन बिल,
  • पति/ पत्नी के पासपोर्ट की छायाप्रति
  • नाबालिगों के मामले में माता-पिता के पासपोर्ट की छायाप्रति
  • नोटः यदि कोई आवेदक पते के सबूत के रूप में केवल राशन कार्ड दाखिल करता है तो ऊपर दी गई श्रेणियों में से एक और पते का सबूत संलग्न किया जाना चाहिए।
२. जन्म प्रमाणपत्र (निम्न में से कोई एक प्रमाणपत्र संलग्न करें):
    • नगर निगम द्वारा जन्म प्रमाणपत्र,
    • आवेदक के स्कूल या किसी भी अन्य मान्यताप्राप्त शिक्षण संस्थान से प्राप्त जन्मतिथि प्रमाणपत्र या अशिक्षित या अर्धशिक्षित आवेदकों द्वारा एनेक्ज़र ‘ए’ में दिये गए नमूने के अनुसार मजिस्ट्रेटनोटरी के समक्ष जन्म की तारीखस्थान के बयान का शपथपत्र।
  • नोटः यदि किसी व्यक्ति का जन्म 26 जनवरी 1989 को या उसके बाद हुआ है तो आवेदकों को केवल नगर निगम प्राधिकरण या जन्म और मरण के रजिस्ट्रार के कार्यालय द्वारा जारी जन्म प्रमाणपत्र हीं स्वीकार किये जाएंगे।

नाबालिग हेतु पासपोर्ट के लिए आवेदन करते हेतु दस्तावेज़

  • एनेक्सर-एच के अनुसार (माता और पिता द्वारा हस्ताक्षरित)एनेक्सर ‘’सी ‘’ (अकेले माता-पिता जो अलग रहते हों पर तलाकशुदा नहीं होंविवाह के बिना जन्मे बच्चे के अकेले माता-पिता)एनेक्सर-जी (जब पासपोर्ट का आवेदन अकेले माता-पिता या कानूनी अभिभावक द्वारा किया जा रहा हो)एनेक्सर-आई (जब 15-18 वर्ष की आयु के नाबालिग को पूरे10 वर्ष की वैधता वाली पासपोर्ट के लिए आवेदन करना हो या यदि अपने नाबालिग बच्चे के लिए आवेदन कर रहे माता-पिता में से किसी के पास भी भारतीय पासपोर्ट नहीं हों)ऐसी किसी भी दशा में आवेदन पत्र में नाबालिग बच्चे के विषय में दिये गए विवरण के समर्थन में घोषणा पत्र वर्णित प्रारूप में जमा करना अनिवार्य होगा-
  • अगर उपलब्ध हो तो दोनों माता-पिता के पासपोर्ट की सत्यापित प्रति,
  • माता-पिता का मूल पासपोर्ट सत्यापन के लिए प्रस्तुत किया जाना चाहिए,
  • यदि माता-पिता में से कोई एक विदेश में रहता होतो विदेश में रहने वाले माता या पिता का भारतीय मिशन द्वारा सत्यापित शपथ-पत्र भी संलग्न करनी चाहिए।

तत्काल योजना के अंतर्गत पासपोर्ट के लिए आवेदन प्रक्रिया

  • अपना आवेदन पत्रतत्काल शुल्कएनेक्सर ‘एफ’ पर दिये गए नमूने के अनुसार सत्यापन प्रमाणपत्र और एनेक्सर ‘आई’ के अनुसार मानक शपथपत्र के साथ जमा करें,
  • पासपोर्ट जारी करने वाले प्राधिकरण को अधिकार है कि वह सत्यापन प्रमाणपत्र की विश्वसनीयता की जाँच लिखित रूप में जारी करने वाले अधिकारी से करें,
  • बिना क्रम के पासपोर्ट जारी करने के लिए अति-आवश्यक होने का सबूत जमा करने की जरूरत नहीं है,
  • तत्काल योजना के अंतर्गत जारी सभी पासपोर्ट के लिए पुलिस द्वारा सत्यापन बाद में की जाएगी,
  • आवेदक को तत्काल योजना के अंतर्गत पासपोर्ट के लिए आवेदन के साथ नीचे दी गई सूची में से कोई तीन दस्तावेज जमा कर पासपोर्ट प्राप्त करने का विकल्प उपलब्ध है। इन तीन दस्तावेजों में से एक फोटो पहचान दस्तावेजनोटरी द्वारा गैर-न्यायिक स्टाम्प पेपर पर एनेक्सर ‘’आई’’ में दिये प्रारूप के अनुसार सत्यापित होनी चाहिए।
  • पासपोर्ट के लिए निम्न दस्तावेजों की सूची में से तीन जमा करनी चाहियेः
    1. मतदाता पहचान कार्ड,
    2. राज्यकेन्द्रीय सरकारसार्वजनिक लोक उपक्रमस्थानीय निकायों या पब्लिक लिमिटेड कंपनियों द्वारा जारी सेवा फोटो पहचान पत्र,
    3. अनुसूचित जातिअनुसूचित जनजातिपिछड़ा वर्ग प्रमाणपत्र,
    4. स्वतंत्रता सेनानी पहचान पत्र,
    5. हथियार लाइसेंस,
    6. संपत्ति से संबंधिति दस्तावेज जैसेपट्टापंजीकृत संलेख आदि,
    7. राशन कार्ड,
    8. पेंशन दस्तावेजजैसेभूतपूर्व-सैनिक का पेंशन बुकपेंशन भुगतान आदेशभूतपूर्व-सैनिक की विधवा/आश्रित प्रमाणपत्रवृद्धावस्था पेंशन आदेशविधवा पेंशन आदेश,
    9. रेलवे परिचय पत्र
    10. पैन कार्ड
    11. बैंककिसानडाक घर पासबुक
    12. मान्यताप्राप्त शिक्षण संस्थानों द्वारा जारी विद्यार्थी परिचय प्रमाण-पत्र
    13. ड्राइविंग लाइसेंस
    14. आरबीडी एक्ट के अंतर्गत जारी जन्म प्रमाणपत्र
    15. गैस कनेक्शन बिल

ऑफलाइन पासपोर्ट के लिए आवेदन प्रक्रिया

  • आवश्यक आवेदन पत्र और फार्मैट डाउनलोड करें और उसे भर लें,
  • भरा हुआ आवेदन पत्र शुल्क व आवश्यक दस्तावेजों के साथ निम्न स्थानों पर जमा करें:
    • पासपोर्ट कार्यालय के काउंटर पर
    • स्पीड पोस्ट केंद्रों पर
    • पासपोर्ट कलेक्शन केंद्रों पर

पासपोर्ट के लिए प्रयुक्त आवेदन पत्रों की सूची

यह फॉर्म नया पासपोर्ट जारी करने हेतुअवधि समाप्त होने पर पुनः जारी करने हेतुपासपोर्ट खो जाने परक्षतिग्रस्त पासपोर्ट के पुनः जारी करने हेतुनाम में परिवर्तन हेतुपहचानपन्नों के खत्म हो जाने की स्थिति में उपयोग किया जाता है। यही आवेदन पत्र नाबालिगों के लिए पासपोर्ट जारी करने के लिए भी प्रयोग में लाया जाता है।
आवेदन पत्र संख्या- 2
इस फॉर्म का उपयोग पुलिस सत्यापन प्रमाणपत्रईसीआर मोहर हटानेपति या पत्नी का नाम शामिल कराने और पता बदलने के लिए प्रयोग किया जाता है। यही फॉर्म छोटी अवधि के पासपोर्ट को पूर्ण अवधि की वैधता में बदलने के लिए भी किया जाता है।
व्यक्तिगत विवरण फार्म (पीपी फार्म)
इस फॉर्म का उपयोग पुलिस सत्यापन की रिपोर्ट के लिये प्रयोग में लाया जाता है। यह आवेदन फार्म संख्या- 1 का एक भाग है। यह पासपोर्ट कार्यालय द्वारा आवश्यकता होने पर पुनः सत्यापन के लिए अलग से भी भरा जा सकता है। यदि आवेदक पिछले एक वर्ष में एक से अधिक स्थान पर रहा होतो प्रत्येक पतेस्थान के लिये पीपी फार्म की अतिरिक्त सेट भरना होगा।

विभिन्न शपथ-पत्र का प्रारूप

  • अशिक्षित आवेदकों द्वारा दाखिल जन्म-तिथि का शपथ-पत्र (एनेक्सर ‘’’’)
  • पहचान प्रमाणपत्र (एनेक्सर बी’’)
  • माता या पिता (जो अलग तो हो गए हों पर तलाक न हुआ होद्वारा नाबालिग बच्चे के पासपोर्ट के लिए शपथपत्र(एनेक्सर ‘’सी’’)
  • विवाह के बाद महिला आवेदक द्वारा नाम बदलने के लिए शपथपत्र (एनेक्सर ‘’डी’’)
  • नाम बदलनेडीड पोललिये गये शपथ-पत्र (एनेक्जर ‘’’’)
  • तत्काल पासपोर्ट के लिए सत्यापन प्रमाणपत्र (एनेक्सर ‘’एफ’’)
  • नाबालिग के लिए पासपोर्ट के लिए माता-पिताअभिभावक की घोषणा (मातापिता में से एक ने सहमति न दी हो) (एनेक्सर ‘’जी’’)
  • नाबालिग पासपोर्ट के लिए माता-पिताअभिभावक की घोषणा (एनेक्सर ‘’एच’’)
  • मानक शपथ-पत्र (एनेक्सर ‘’आई’’)
  • नमूना सत्यापन प्रमाणपत्र (एनेक्सर ‘’जे’’)
  • अधिकार पत्र
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और आधिक जानकारी के लिये या 
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हमारा पता है 

समाधान सर्विसेज 
त्रिपोलिया रोड, पानी की टंकी के पास, बांसवाडा (राज.)
फोन : 02962-240108