शनिवार, 31 मई 2014

कृष्ण और उनका जीवन

'न कोई मरता है और न ही कोई मारता है, सभी निमित्त मात्र हैं...सभी प्राणी जन्म से पहले बिना शरीर के थे, मरने के उपरांत वे बिना शरीर वाले हो जाएँगे। यह तो बीच में ही शरीर वाले देखे जाते हैं, फिर इनका शोक क्यों करते हो।'- कृष्ण 
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कृष्ण पूर्ण योगी और यौद्धा थे। यमुना के तट पर और यमुना के ही जंगलों में गाय और गोपियों के संग-साथ रहकर बाल्यकाल में कृष्ण ने पूतना, शकटासुर, यमलार्जुन, कलिय-दमन, प्रलंब, अरिष्ट आदि का संहार किया तो किशोरावस्था में बड़े भाई बलदेव के साथ कंस का वध किया। जवान होते-होते उनकी दूर-दूर तक ख्याति फैल गई थी। फिर भी कृष्ण का जीवन सफलताओं और असफलताओं की एक लंबी और रोचक दास्तान है।

कृष्ण के बाल जीवन पर अनेक किस्से लिखे गए हैं लेकिन महाभारत में कृष्ण के बाल्यकाल का वृत्तांत नहीं मिलता। महाभारत के हरिवंश पर्व में ही कृष्ण का जीवन वृत्तांत मिलता है। महाभारत के भीष्म पर्व में भीष्म द्वारा कृष्ण की जो महिमा का वर्णन किया गया है वह शिशुपाल द्वारा आपत्ति लिए जाने के कारण ही किया गया था। यह सब वचन प्रशंसा के निमित्त ही कहे गए थे। भीष्म ने कृष्ण के उत्तम चरित्र को देखकर उन्हें नारायण हरि का पद दिया था।

कृष्ण जन्म : हिंदू मान्यता अनुसार विष्णु ने आठवें मनु वैवस्वत के मन्वंतर के अट्ठाईसवें द्वापर में आठवें अवतार श्रीकृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ से मथुरा के कारागर में जन्म लिया था। उनका जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की रात्रि के सात मुहूर्त निकल गए और आठवाँ उपस्थित हुआ तभी आधी रात के समय सबसे शुभ लग्न में हुआ। उस लग्न पर केवल शुभ ग्रहों की दृष्टि थी। रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग में ईसा से लगभग 3200 वर्ष पूर्व उनका जन्म हुआ। ज्योतिषियों अनुसार उस समय शून्य काल (रात 12 बजे) था।

ऐतिहासिक अनुसंधानों के आधार पर श्रीकृष्ण का जन्म लगभग 1500 ई.पू. माना जाता है, जो कि अनुचित है। हिंदू काल गणना अनुसार आज से लगभग 5235 वर्ष पूर्व कृष्ण का जन्म हुआ था।

कालिया नाग : कदंब वन के समीप एक नाग जाति का व्यक्ति रहता था, जिसे पुराणों ने नाग ही घोषित कर दिया। उक्त व्यक्ति बालक कृष्ण के द्वार पर आ धमका था। जबकि घर में कोई नहीं था, लेकिन बलशाली कृष्ण ने उक्त व्यक्ति को तंग कर वहाँ से भगा दिया। इसी प्रकार वहीं ताल वन में दैत्य जाति का धनुक नाम का अत्याचारी व्यक्ति रहता था जिसे बलदेव ने मार डाला था। उक्त दोनों घटना के कारण दोनों भाइयों की ख्‍याति फैल गई थी।

कृष्ण की पत्नी और प्रेमिका : कृष्ण को चाहने वाली अनेक गोपियाँ और प्रेमिकाएँ थीं। कृष्ण-भक्त कवियों ने अपने काव्य में गोपी-कृष्ण की रासलीला को प्रमुख स्थान दिया है। पुराणों में गोपी-कृष्ण के प्रेम संबंधों को आध्यात्मिक और अति श्रृंगारिक रूप दिया गया है। महाभारत में यह आध्यात्मिक रूप नहीं मिलता।

रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती आदि कृष्ण की विवाहिता पत्नियाँ हैं। राधा, ललिता आदि उनकी प्रेमिकाएँ थीं। उक्त सभी को सखियाँ भी कहा जाता है। राधा की कुछ सखियाँ भी कृष्ण से प्रेम करती थीं जिनके नाम निम्न हैं:- चित्रा, सुदेवी, ललिता, विशाखा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रग्डदेवी और सुदेवी हैं। ब्रह्मवैवर्त्त पुराण अनुसार कृष्ण की कुछ ही प्रेमिकाएँ थीं जिनके नाम इस तरह हैं:- चन्द्रावली, श्यामा, शैव्या, पद्या, राधा, ललिता, विशाखा तथा भद्रा।

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कंश का वध : किसी ने कंस को बताया कि वासुदेव और देवकी की संतान ही उसकी मृत्यु का कारण होगी। अत: कंस उक्त दोनों की संतान के उत्पन्न होते ही मार डालता था। कृष्ण वासुदेव की आठवीं संतान थे। वासुदेव इस संतान को चोरी-चोरी नंदग्राम में नंद ग्वाले के घर रख आए और फिर कृष्ण का वहीं पालन-पोषण हुआ। इसी काल में कृष्ण की दूसरी माँ के पुत्र बलराम को भी वहाँ लाकर रख दिया था। दोनों भाई वहीं पले-बढ़े।

कालिया और धनुक का सामना करने के कारण दोनो भाइयों की ख्याति के चलते कंस समझ गया कि ज्योतिष भविष्यवाणी अनुसार इतने बलशाली तो वासुदेव और देवकी के पुत्र ही हो सकते हैं। तब कंस ने दोनों भाइयों को पहलवानी के लिए निमंत्रण ‍दिया क्योंकि कंस चाहता था कि इन्हें पहलवानों के हाथों मरवा दिया जाए, लेकिन दोनों भाइयों ने पहलवानों के शिरोमणि चाणूर और मुष्टिक को मारकर कंस को पकड़ लिया और सबके देखते-देखते ही उसको भी मार दिया।

कृष्ण की शिक्षा-दीक्षा: योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने वेद और योग की शिक्षा और दीक्षा उज्जैन स्थित महर्षि सांदीपनि के आश्रम में रहकर हासिल की थी। उस काल में उज्जैन को उज्जयिनी व अवंतिका कहा जाता था। वहाँ से शिक्षा पाकर वे मथुरा की रक्षा करने लगे। कंस के मरने पर उन्होंने मथुरा में वृष्णि, अंधक, भोज और शनि वंशों का गणराज्य स्थापित किया था।

जरासंघ का आक्रमण: जरासंघ कंस का श्वसुर था। कंस की पत्नी मगथ नरेश जरासंघ को बार-बार इस बात के लिए उकसाती थी कि कंस का बदला लेना है। इस कारण जरासंघ ने मथुरा के राज्य को हड़पने के लिए कई आक्रमण किए तब अंतत: कृष्ण ने अपने सजातियों को मथुरा छोड़ देने पर राजी कर लिया। वे सब मथुरा छोड़कर रैवत पर्वत के समीप कुशस्थली पुरी (द्वारिका) में जाकर बस गए।- महाभारत मौसल- 14.43-50 

भौमासुर से युद्ध : इस पलायन के दौरान हिमालय जिसे देवलोक कहा जाता था वहाँ भौमासुर का राज्य हो चला था जो देवताओं को सताया करता था। उसने इंद्र की माता अदिति के कुंडल छीन लिए थे और वह उसे वापस नहीं कर रहा था। तब देवों के कहने पर कृष्ण ने भौमासुर से युद्ध करना स्वीकार कर लिया। लेकिन उन्होंने दो शर्तें उपस्थित कर दीं। एक तो उन्होंने सुदर्शन चक्र माँगा और दूसरा युद्ध के लिए गरुड़ यान। तब ही वे युद्ध करेंगे। देवराज इंद्र ने यह स्वीकार कर लिया। चक्र और गरुढ़ यान होने के कारण उन्हें विष्णु का अवतार माना जाने लगा। क्योंकि यह दोनों ‍वस्तुएँ सिर्फ विष्णु के पास ही होती थीं। सुदर्शन चक्र को उस काल में बहुत ही घातक अस्त्र माना जाता था।

कृष्ण की गीता : वेदों का सार है उपनिषद और उपनिषदों का सार 'गीता' को माना है। कृष्ण ने महाभारत युद्ध के दौरान महाराजा पांडु एवं रानी कुंती के तीसरे पुत्र अर्जुन को जो ज्ञान दिया वह गीता के नाम से प्रसिद्ध हुआ। गीता में सब कुछ है- दर्शन है, योग है, धर्म है और नीति भी। गीता कृष्ण द्वारा महाभारत के भीष्मपर्व में अर्जुन को दिया गया ज्ञान है। इसे महाभारत के साथ पढ़ने और समझने से ही लाभ मिलता है। अन्यत्र से नहीं।

महाभारत युद्ध : विश्व इतिहास में महाभारत के युद्ध को धर्मयुद्ध के नाम से जाना जाता है। आर्यभट्‍ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ई.पू. में हुआ। इस युद्ध के 35 वर्ष पश्चात भगवान कृष्ण ने एक बाण लगने के कारण देह छोड़ दी थी।

महाभारत युद्ध चंद्रवंशियों के दो परिवार कौरव और पांडव के बीच हुआ था। उक्त लड़ाई आज के हरियाणा स्थित कुरुक्षेत्र के आसपास हुई मानी गई है। इस युद्ध में पांडव विजयी हुए थे। इस लड़ाई में कृष्ण पांडवों के साथ थे। बलदेव दुर्योधन की ओर से लड़ना चाहते थे लेकिन कृष्ण के पांडवों की ओर होने से उन्होंने युद्ध का त्याग कर दिया। इस युद्ध के बाद यदुवंशियों में आपसी फूट पड़ गई और वे सभी आपस में लड़कर ही मर गए। पारिवारिक युद्ध के चलते कृष्ण के पुत्र साम्ब, चारुदेष्ण, और प्रद्युम्न तथा पोते अनिरुद्ध भी जब युद्ध में मारे गए तो कृष्ण ने क्रोधवश शेष बचे यादवों का नाश कर दिया।- महाभारत मौसल-3.41-3.46

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तपस्या और महाप्रयाण : यादवों का नाश होने के पश्चात्य उन्होंने अपने पिता से कहा कि आपने यदुवंशियों का विनाश देखा इससे पूर्व आपने कुरुवंशियों का नाश देखा। अब मैं यादवों के बिना द्वारिका की रक्षा करने में असमर्थ हूँ। अंत: वन में जाकर बलदेवजी के साथ तपस्या करूँगा।- महाभारत मौसल-4-6

वन में श्रीकृष्ण भूमि पर लेटे थे। उस समय एक व्याघ मृगों को मारने की इच्छा से उधर आ निकला। व्याघ ने दूर से श्रीकृष्ण को मृग समझकर उन पर बाण चला दिया। जब वह पास आया तो पीताम्बरधारी कृष्ण को वहाँ देख भयभीत हो खड़ा रह गया। 119 वर्ष की उम्र में कृष्ण ने देह छोड़ दी।

परमात्मा और कृष्ण : कृष्ण को महर्षि वेद व्यास परमात्मा मानते थे। महाभारत को छोड़कर कृष्ण के जीवन चरित्र के संबंध में पुराणों या अन्य ग्रंथों में अतिरंजित चित्रण किया गया। जबकि गीता और महाभारत में अनेक स्थानों पर कृष्ण ने स्वयं को कभी ईश्वर या परमात्मा नहीं कहा।

गीता के श्लोक 13-19 में परमात्मा, आत्मा और प्रकृति में भेद माना है। गीता और महाभारत में कई स्थानों पर भगवान कृष्ण ने परमात्मा की सत्ता को स्वीकार कर यह सिद्ध किया है कि वे स्वयं परमात्मा नहीं हैं। गीता में अनेक स्थानों पर परमात्मा को अन्य वचन में कहा गया है। जहाँ उत्तम पुरुष (मैं) में लिखा गया है वहाँ उक्त काल व परिस्थितिवश विशेष प्रयोजन में ऐसा हो सकता है।

भगवान का अर्थ जो समस्त ऐश्वर्य-युक्त हो तथा धर्म, यश, लक्ष्मी, ज्ञान वैराग्य से युक्त हो। जो योगयुक्त मोक्ष में स्थित है उसे ही स्थितप्रज्ञ, भगवान, अरिहंत या बुद्ध कहा जाता है। भगवान शब्द का उपयोग परमात्मा या ईश्वर के लिए भी किए जाने से भ्रम उत्पन्न होता है।

अंतत: कृष्ण के जीवन के कई उलझे हुए पहलू हैं जिन्हें समझना आसान नहीं है किंतु फिर भी महाभारत का गहन अध्ययन किया जाए तो उनके जीवन की सच्चाई को जाना जा सकता है। आज जरूरत इस बात की है कि हम कृष्ण के जीवन को पौराणिक गाथा और चमत्कारों से हटाकर ऐतिहासिक तथ्यों के साथ लिखें। इति। श्रीकृष्णाय शरणम मम्।

कर्मों में कुशलता है योग-कृष्ण

'तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम्'-गी. 2-50 अर्थात इससे समत्वबुद्धि योग के लिए ही चेष्टा करो, यह समत्वबुद्धि-रूप योग ही कर्मों में चतुरता है। अर्थात कर्मो में कुशलता को ही योग कहते है। सुकर्म, अकर्म और विकर्म- तीन तरह के कर्मों की योग और गीता में विवेचना की गई है।

krishna


कर्म : सुकर्म वह है जो धर्म और योग युक्त आचरण है। पलायनवादी चित्त को प्रदर्शित करता है अकर्म, जो जीवन के हर मोर्चे से भाग जाए ऐसा अकर्मी तटस्थ और संशयी बुद्धि माना जाता है। वह दुर्बल और भीरू होता है और यह भी कि उसे मौन समर्थक कहा जाता है। सुकर्म और विकर्म का अस्तित्व होता है परन्तु अकर्म का नहीं।

कर्म में कुशलता : कर्मवान अपने कर्म को कुशलता से करता है। कर्म में कुशलता आती है कार्य की योजना से। योजना बनाना ही योग है। योजना बनाते समय कामनाओं का संकल्प त्यागकर विचार करें। तब कर्म को सही दिशा मिलेगी। कामनाओं का संकल्प त्याग का अर्थ है ऐसी इच्छाएँ न रखे जो केवल स्वयं के सुख, सुविधाओं और हितों के लिए हैं। अत: स्वयं को निमित्त जान कर्म करो जिससे कर्म का बंधन और गुमान नहीं रहता। निमित्त का अर्थ उस एक परमात्मा द्वारा कराया गया कर्म जानो।- भ.गी. 5-8,9

समत्व बुद्धि : जिस मनुष्य का जीवन योगयुक्त है, उसे जीवन चलाने के कर्म बंधन में बाँधने वाले नहीं होते। जैसे कमल किचड़ में रहकर भी कमल ही रहता है। युक्त और अयुक्त का अर्थ योगयुक्त और योगअयुक्त से है अर्थात योग है समत्व बुद्धि। समत्वं योग उच्यते-भ.गी.6-7,8। 5-8,9।

समत्व बुद्धि से तात्पर्य सोच-विचार कर किए गए कर्म को योगयुक्त कर्म कहते है। समत्व बुद्धि से अर्थ सुख-दुख, विजय-पराजय, हर्ष-शोक, मान-अपमान इत्यादि द्वन्द्वों में विचलित हुए बगैर एक समान शांत चित्त रहे- वही कर्मयोगी कहलाता है।

कर्म का महत्व : गीता में कर्म योग का बहुत महत्व है। कर्म बंधन से मुक्त का साधन योग बताता है। कर्मों से मुक्ति नहीं, कर्मों के जो बंधन है उससे मुक्ति ही योग है। कर्म बंधन अर्थात हम जो भी कर्म करते है उससे जो शरीर और मन पर प्रभाव पड़ता है उस प्रभाव के बंधन से आवश्यक है। जहाँ तक अच्छा प्रभाव पड़ता है वहाँ तक सही है किंतु योगी सभी तरह के प्रभाव बंधन से मुक्ति चाहता है। यह ‍मुक्ति ही स्थितिप्रज्ञ योग है। अर्थात् अविचलित बुद्धि और शरीर। भय और चिंता से योगी न तो भयभित होता है और न ही उस पर वातावरण का कोई असर होता है।

स्थितप्रज्ञ : जैसे जहाज को चलाने वाले के पास ठीक दिशा बताने वाला कम्पास या यंत्र होना चाहिए उसी तरह श्रेष्ठ जीवन जीने के तथा मोक्ष के अभिलाषी व्यक्ति के पास 'योग' होना चाहिए। योग नहीं तो जीवन दिशाहीन है। यही बात कृष्ण ने गीता में स्थितप्रज्ञ के विषय में कही है। बुद्धि को निर्मल और तीव्र करने के लिए योग ही एक मात्र साधन है। योग स्‍थित व्यक्ति साधारण मनुष्यों से विलक्षण देखने लगता है।

'सर्दी-गरमी, मान-अपमान, सुख-दुख में जिसका चित्त शांत रहता है और जिसका आत्मा इंद्रियों पर विजयी है, वह परमात्मा में लीन व्यक्ति योगारूढ़ कहा जाता है। 'योगी लोहा, मिट्टी, सोना इत्यादि को एक समान समझता है। वह ज्ञान-विज्ञान से तृप्त रहता है। वह कूटस्थ होता है, जितेन्द्रिय होता है और उसका आत्मा परमात्मा से युक्त होता है। भ.गी. 6-2,3,4,7/ 6-8,9।

विलक्षण समन्वय : गीता में ज्ञान, कर्म और भक्ति का विलक्षण समन्वय हुआ है। ज्ञानमार्ग या ज्ञान योग को ध्यान योग भी कहा जाता है जो कि योग का ही एक अंग है। भक्ति मार्ग या भक्तियोग भी आष्टांग योग के नियम का पाँचवाँ अंग ईश्वर प्राणिधान है। इस तरह कृष्ण ने गीता में योग को तीन अंगों में सिमेट कर उस पर परिस्थिति अनुसार संक्षित विवेचन किया है।

व्यायाम मात्र नहीं : बिना ज्ञान के योग शरीर और मन का व्यायाम मात्र है। ज्ञान प्राप्त होता है यम और नियम के पालन और अनुशासन से। यम और नियम के पालन या अनुशासन के बगैर भक्ति जाग्रत नहीं होती। तब योग और गीता कहते है कि कर्म करो, चेष्ठा करो, संकल्प करो, अभ्यास करो, जिससे ‍की ज्ञान और भक्ति का जागरण हो। अभ्यास से धीरे-धीरे आगे बढ़ों। कर्म में कुशलता ही योग है। कर्म से शरीर और मन को साधा जा सकता है और कर्म से ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है इसलिए जबरदस्त कर्म करो।

जैसे वायु रहित स्थान में दीपक की लौ स्थिर रहती है, वैसे ही योगी का चित्त स्थिर रहता है।-6-19 - योगेश्वर श्रीकृष्ण

अतत: : योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने योग की शिक्षा और दिक्षा उज्जैन स्थित महर्षि सांदिपनी के आश्रम में रह कर हासिल की थी। वह योग में पारगत थे तथा योग द्वारा जो भी सिद्धियाँ स्वत: की प्राप्य थी उन सबसे वह मुक्त थे। सिद्धियों से पार भी जगत है वह उस जगत की चर्चा गीता में करते है। गीता मानती है कि चमत्कार धर्म नहीं है।

बहुत से योगी योग बल द्वारा जो चमत्कार बताते है योग में वह सभी वर्जित है। सिद्धियों का उपयोग प्रदर्शन के लिए नहीं अपितु समाधि के मार्ग में आ रही बाधा को हटाने के लिए है।
।। ॐ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।। प्रणतः क्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः। ॐ।

''हे धनंजय! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है। माया द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे आसुर-स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मुझको नहीं भजते।''- गीत

कृष्ण को ईश्वर मानना अनुचित है, किंतु इस धरती पर उनसे बड़ा कोई ईश्वर तुल्य नहीं है, इसीलिए उन्हें पूर्ण अवतार कहा गया है। कृष्ण ही गुरु और सखा हैं। कृष्ण ही भगवान है अन्य कोई भगवान नहीं। कृष्ण हैं राजनीति, धर्म, दर्शन और योग का पूर्ण वक्तव्य। कृष्ण को जानना और उन्हीं की भक्ति करना ही हिंदुत्व का भक्ति मार्ग है। अन्य की भक्ति सिर्फ भ्रम, भटकाव और निर्णयहीनता के मार्ग पर ले जाती है। भजगोविंदम मूढ़मते।

कृष्ण जन्म : पुराणों अनुसार आठवें अवतार के रूप में विष्णु ने यह अवतार आठवें मनु वैवस्वत के मन्वंतर के अट्ठाईसवें द्वापर में श्रीकृष्ण के रूप में देवकी के गर्भ से मथुरा के कारागर में जन्म लिया था। उनका जन्म भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की रात्रि के सात मुहूर्त निकल गए और आठवाँ उपस्थित हुआ तभी आधी रात के समय सबसे शुभ लग्न उपस्थित हुआ। उस लग्न पर केवल शुभ ग्रहों की दृष्टि थी। रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग में लगभग 3112 ईसा पूर्व (अर्थात आज से 5121 वर्ष पूर्व) को हुआ हुआ। ज्योतिषियों अनुसार रात 12 बजे उस वक्त शून्य काल था।

कृष्ण पर शोध : हाल ही में ब्रिटेन में रहने वाले शोधकर्ता ने खगोलीय घटनाओं, पुरातात्विक तथ्यों आदि के आधार पर कृष्ण जन्म और महाभारत युद्ध के समय का सटिक वर्णन किया है। ब्रिटेन में कार्यरत न्यूक्लियर मेडिसिन के फिजिशियन डॉ. मनीष पंडित ने महाभारत में वर्णित 150 खगोलिय घटनाओं के संदर्भ में कहा कि महाभारत का युद्ध 22 नवंबर 3067 ईसा पूर्व को हुआ था। उस वक्त भगवान कृष्ण 55-56 वर्ष के थे।

उन्होंने अपनी खोज के लिए टेनेसी के मेम्फिन यूनिवर्सिटी में फिजिक्स के प्रोफेसर डॉ. नरहरि अचर द्वारा 2004-05 में किए गए शोध का हवाला भी दिया। इसके संदर्भ में उन्होंने पुरातात्विक तथ्यों को भी शामिल किया। जैसे कि लुप्त हो चुकी सरस्वती नदी के सबूत, पानी में डूबी द्वारका और वहाँ मिले कृष्ण-बलराम के की छवियों वाले पुरातात्विक सिक्के और मोहरे, ग्रीक राजा हेलिडोरस द्वारा कृष्ण को सम्मान देने के पुरातात्विक सबूत आदि।

महाभारत, गीता और कृष्ण के समय के संबंध में मेक्समूलर, बेबेर, लुडविग, हो-ज्मान, विंटरनिट्स फॉन श्राडर आदि सभी विदेशी विद्वानों द्वारा फैलाई गई भ्रांतियों का कुछ भारतीय विद्वानों ने भी अनुसरण कर भ्रम के जाल को और बढ़ावा दिया है। भारत में ब्रह्माकुमारी जैसे मिशनों ने भी कृष्ण और महाभारत युद्ध की ऐतिहासिकता के संबंध में भ्रम फैला रखा है। उक्त की बातों को जोरदार तरीके से खंडन कर कृष्ण पर समग्र शोध किए जाने की आवश्यकता है।

दयानंद सरस्वती ने विदेशी विद्वानों की बातों का खंडन कर अपनी पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में एक लेख लिखा था जिसमें युद्धिष्ठिर से लेकर अंतिम हिंदू राजा यशपाल तक के नाम दिए है। यशपाल को शाहबुद्दीन ने पराजित करदिल्ली पर अपना आधिपत्य कायम किया था।

कृष्ण जीवन : श्रीकृष्ण का जीवन, जैसा कि महाभारत में वर्णित है वही इतिहास सिद्ध है बाकी सभी विस्तार, अलंकार और श्रृंगार की बातें हैं। वेदों के गोपी, गोपि‍का और रास का गलत अर्थ निकाले जाने के कारण भागवत और ब्रह्मवैवर्त सहित अन्य पुराणों में उनके जीवन चरित्र को श्रृंगारिक रूप दिया गया है। श्रीकृष्ण ऐतिहासिक पुरुष हुए हैं, जो अपने कर्मों से मनुष्य से भगवान या महामानव हो गए न कि ईश्वर। न वे सृष्टि रचयिता हैं और न ही सृष्टिपालक। वे तो महामानव हैं।

श्रीकृष्ण शिक्षा-दीक्षा : योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने वेद और योग की शिक्षा और दीक्षा उज्जैन स्थित महर्षि सांदिपनी के आश्रम में रह कर हासिल की थी। वह योग में पारगत थे तथा योग द्वारा जो भी सिद्धियाँ होती है वह स्वत: ही उन्हें प्राप्य थी। सिद्धियों से पार भी जगत है वह उस जगत की चर्चा गीता में करते हैं। गीता मानती है कि चमत्कार धर्म नहीं है। स्थितप्रज्ञ हो जाना ही धर्म है।

महाभारत के कृष्ण
श्रीकृष्ण का जीवन, जैसा कि महाभारत में वर्णित है वही इतिहास सिद्ध है बाकी सभी विस्तार, अलंकार और श्रृंगार की बातें हैं।
कृष्ण लीलाएँ : कृष्ण के जीवन में बहुत रोचकता और उथल-पुथल रही है। बाल्यकाल में वे दुनिया के सर्वाधिक नटखट बालक रहे, तो किशोर अवस्था में गोपियों के साथ पनघट पर नृत्य करना और बाँसुरी बजाना उनके जीवन का सबसे रोचक प्रसंग है। कुछ और बड़े हुए तो मथुरा में कंस का वध कर प्रजा को अत्याचारी राजा कंस से मुक्त करने के उपरांत कृष्ण ने अपने माता-पिता को भी कारागार से मुक्त कराया। इसके अलावा कृष्ण ने पूतना, शकटासुर, यमलार्जुन मोक्ष, कलिय-दमन, धेनुक, प्रलंब, अरिष्ट आदि राक्षसों का संहार किया था। श्रीकृष्ण ही ऐसे थे जो इस पृथ्वी पर सोलह कलाओं से पूर्ण होकर अवतरित हुए थे। और उनमें सभी तरह की शक्तियाँ थी।

कृष्ण पत्नी और प्रेमिका : कृष्ण को चाहने वाली अनेकों गोपियाँ और प्रेमिकाएँ थी। कृष्ण-भक्त कवियों ने अपने काव्य में गोपी-कृष्ण की रासलीला को प्रमुख स्थान दिया है। पुराणों में गोपी-कृष्ण के प्रेम संबंधों को आध्यात्मिक और अति श्रांगारिक रूप दिया गया है। महाभारत में यह आध्यात्मिक रूप नहीं मिलता।

रुक्मिणी, सत्यभामा, जाम्बवती आदि कृष्णकी विवाहिता पत्नियाँ हैं। राधा, ललिता आदि उनकी प्रेमिकाएँ थी। उक्त सभी को सखियाँ भी कहा जाता है। राधा की कुछ सखियाँ भी कृष्ण से प्रेम करती थी जिनके नाम निम्न है:- चित्रा, सुदेवी, ललिता, विशाखा, चम्पकलता, तुंगविद्या, इन्दुलेखा, रग्डदेवी और सुदेवी हैं। ब्रह्मवैवर्त्त पुराण अनुसार कृष्ण की कुछ ही प्रेमिकाएँ थी जिनके नाम इस तरह है:- चन्द्रावली, श्यामा, शैव्या, पद्या, राधा, ललिता, विशाखा तथा भद्रा।

कर्म योगी कृष्ण : गीता में कर्म योग का बहुत महत्व है। गीता में कर्म बंधन से मुक्ति के साधन बताएँ हैं। कर्मों से मुक्ति नहीं, कर्मों के जो बंधन है उससे मुक्ति। कर्म बंधन अर्थात हम जो भी कर्म करते हैं उससे जो शरीर और मन पर प्रभाव पड़ता है उस प्रभाव के बंधन से मुक्ति आवश्यक है।

कृष्ण ने जो भी कार्य किया उसे अपना कर्म समझा, अपने कार्य की सिद्धि के लिए उन्होंने साम-दाम-दंड-भेद सभी का उपयोग किया, क्योंकि वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण जीते थे और पूरी जिम्मेदारी के साथ उसका पालन करते थे। न अतीत में और न भविष्य में, जहाँ हैं वहीं पूरी सघनता से जीना ही उनका उद्देश्य रहा।

कृष्ण निवास : गोकुल, वृंदावन और द्वारिका में कृष्ण ने अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण क्षण गुजारे। पूरे भारतवर्ष में कृष्ण अनेकों स्थान पर गए। वे जहाँ-जहाँ भी गए उक्त स्थान से जुड़ी उनकी गाथाएँ प्रचलित है लेकिन मथुरा उनकी जन्मभूमि होने के कारण हिंदू धर्म का प्रमुख तीर्थ स्थल है।

महाभारत का युद्ध : कौरवों और पांडवों के बीच हस्तिनापुर की गद्दी के लिए कुरुक्षेत्र में विश्व का प्रथम विश्वयुद्ध हुआ था। कुरुक्षेत्र हरियाणा प्रान्त का एक जिला है। मान्यता है कि यहीं भगवान कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था।

कृष्ण इस युद्ध में पांडवों के साथ थे। आर्यभट्‍ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ई.पू. में हुआ। नवीनतम शोधानुसार यह युद्ध 3067 ई. पूर्व हुआ था। इस युद्ध के 35 वर्ष पश्चात भगवान कृष्ण ने देह छोड़ दी थी। तभी से कलियुग का आरम्भ माना जाता है।

कृष्ण जन्म और मृत्यु के समय ग्रह-नक्षत्रों की जो स्थिति थी उस आधार पर ज्योतिषियों अनुसार कृष्ण की आयु 119-33 वर्ष आँकी गई है। उनकी मृत्यु एक बहेलिए के तीर के लगने से हुई थी।

गीता प्रवचन : कृष्ण ने महाभारत युद्ध के दौरान महाराजा पांडु एवं रानी कुंती के तीसरे पुत्र अर्जुन को जो उपदेश दिया वह गीता के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वेदों का सार है उपनिषद और उपनिषदों के सार को गीता कहा गया है। ऋषि वेदव्यास महाभारत ग्रंथ के रचयिता थे। गीता महाभारत के भीष्मपर्व का हिस्सा है।

स्वयं भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा है कि युद्ध क्षेत्र में जो ज्ञान मैंने तुझे दिया था उस वक्त मैं योगयुक्त था। अत: उस अवस्था में परमात्मा की बात कहते हुए, वह परमात्मा के प्रतिनिधि बनते हुए परमात्मा के लिए मैं, मेरा, मुझे इत्यादि शब्दों का प्रयोग करते हैं इससे यह आशय नहीं कि वे खुद परमात्मा हैं या उनमें किसी प्रकार का अहंकार है।

द्वारिका निर्माण : कंस वध के बाद श्रीकृष्ण ने गुजरात के समुद्र के तट पर द्वारिका का निर्माण कराया और वहाँ एक नए राज्य की स्थापना की। कालांतर में यह नगरी समुद्र में डूब गई, जिसके कुछ अवशेष अभी हाल में ही खोजे गए हैं। आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित शारदापीठ भी यहीं पर स्थित है। हिंदुओं को चार धामों में से एक द्वारिका धाम को द्वारिकापुरी मोक्ष तीर्थ कहा जाता है। स्कंदपुराण में श्रीद्वारिका महात्म्य का वर्णन मिलता है।

जैन धर्म  : जैन धर्म के २२वें तीर्थंकर अरिष्ट नेमिनाथ भगवान जो कृष्ण के चचेरे भाई थे, कृष्ण इनके पास बैठकर इनके प्रवचन सुना करते थे। जैन धर्म ने कृष्ण को उनके त्रैषठ शलाका पुरुषों में शामिल किया है, जो बारह नारायणों में से एक है। ऐसी मान्यता है कि अगली चौबीसी में कृष्ण जैनियों के प्रथम तीर्थंकर होंगे।

''उन-उन भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे लोग अपने स्वभाव से प्रेरित होकर उस-उस नियम को धारण करके अन्य देवताओं को भजते हैं अर्थात पूजते हैं। परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्त में वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।''-कृष्ण