सोमवार, 6 मई 2024

मैं अपने स्कूल की वेबसाइट क्यों बनवाऊ मुझे क्या फायदा होगा ??? 




दोस्तों स्कूल के लिए वेबसाइट का महत्व आजकल बढ़ रहा है। आज हम यहाँ जानेगे की "अपने स्कूल की वेबसाइट क्यों बनवाये और इससे क्या फायदा होगा ???"
इस तकनीकी युग में, जहां हर क्षण अद्यतन और डिजिटल हो रहा है, वेबसाइटें एक नए द्वार के रूप में सामाजिक, विश्वासनीय और ज्ञानवर्धक साधन बन चुकी हैं। विशेष रूप से स्कूलों के मामले में, वेबसाइटें उन्हें एक नया प्लेटफ़ॉर्म प्रदान करती हैं जिसके माध्यम से वे अपने छात्रों, अभिभावकों, और समुदाय के साथ संवाद कर सकते हैं। यहां हम विस्तार से वेबसाइट के महत्व और इसके फायदे पर चर्चा करेंगे।






1. प्रवेश प्रक्रिया ऑनलाइन की जा सकती है


चीजों को आसान बनाने के लिए, यदि वे अभी भी इसे मैन्युअल रूप से कर रहे हैं, तो आपको ऑनलाइन प्रवेश पर स्विच करना चाहिए। यह न केवल आपके स्टाफ के लिए बल्कि आपके छात्रों और अभिभावकों के लिए भी सुविधाजनक है।


 

 


















2. छात्रों और शिक्षकों के बीच संचार आसान हो जाता है

स्कूल की वेबसाइटें विभिन्न तरीकों से शिक्षकों और छात्रों के बीच एक प्रभावी संचार चैनल के रूप में काम कर सकती हैं:
  • शिक्षक घोषणाएँ पोस्ट करने, कक्षा शेड्यूल साझा करने और चल रहे असाइनमेंट पर अपडेट प्रदान करने के लिए स्कूल की वेबसाइट का उपयोग कर सकते हैं।
  • वेबसाइट का उपयोग शैक्षिक सामग्री जैसे व्याख्यान नोट्स, प्रस्तुतियाँ और अन्य संसाधन अपलोड करने के लिए किया जा सकता है जो छात्रों को उनकी पढ़ाई में मदद कर सकते हैं।
  • शिक्षक वेबसाइट पर चर्चा मंच, ऑनलाइन चैट रूम और ईमेल सेवाएं स्थापित कर सकते हैं, जो छात्रों को प्रश्न पूछने, विचार साझा करने और अपने शिक्षकों के साथ अधिक सुविधाजनक तरीके से बातचीत करने की अनुमति दे सकते हैं।

स्कूल की वेबसाइट का महत्व यह है कि वेबसाइट का प्रभावी ढंग से उपयोग करके, शिक्षक अपने छात्रों के साथ अधिक सुव्यवस्थित और प्रभावी संचार चैनल स्थापित कर सकते हैं।


3. वेबसाइटें डिजिटल शिक्षा उपकरण प्रदान कर सकती हैं

स्कूल की वेबसाइट होने का मुख्य लाभ यह है कि आप इसमें डिजिटल शैक्षिक उपकरण शामिल कर सकते हैं। चूँकि COVID-19 ने शैक्षिक जगत को दूरस्थ शिक्षा के लिए विभिन्न प्लेटफार्मों का उपयोग करने के लिए मजबूर किया है, माता-पिता इस सुविधा को अत्यधिक महत्व देते हैं, इसलिए आज, इस प्रकार की तकनीक शिक्षण और सीखने के लिए अभिन्न अंग है।

Google क्लासरूम का उपयोग करना और अपने शिक्षकों और छात्रों के लिए संस्थागत खाते बनाना आपको ऑनलाइन कक्षा सत्रों पर अधिक नियंत्रण दे सकता है।
 
4. समाज का हिस्सा बनना

यदि आप केवल सोशल मीडिया पर निर्भर रहेंगे तो आपके स्कूल की ऑनलाइन पहुंच सीमित होगी। आप एक वेबसाइट की मदद से अपने स्कूल को अलग पहचान दे सकते हैं।
 
5. अपने स्कूल की ब्रांडिंग बढ़ाएँ

आपके स्कूल की ब्रांडिंग को विभिन्न मार्केटिंग रणनीतियों के माध्यम से बढ़ाया जा सकता है, और सबसे अच्छे में से एक वेबसाइट बनाना है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि एक वेबसाइट होने से आपके स्कूल के लक्षित बाजार में ब्रांड जागरूकता बढ़ेगी।

आप स्कूल की वेबसाइट की मदद से अपने स्कूल की पहचान की छवि को लोगो, रंग और नारे सहित पूरे ऑनलाइन समुदाय में फैलाने में सक्षम होंगे।
 
6. इससे आपके विद्यालय की विश्वसनीयता बढ़ती है

आधुनिक धारणा के अनुसार, आधिकारिक वेबसाइट वाली कंपनी को आजकल विश्वसनीय माना जाता है। हालाँकि, सिर्फ इसलिए कि आपके स्कूल की कोई वेबसाइट नहीं है इसका मतलब यह नहीं है कि यह विश्वसनीय नहीं है। इसलिए, किसी स्कूल की वेबसाइट उसकी विश्वसनीयता बढ़ा सकती है।
 
7. प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्राप्त करें

स्कूल की वेबसाइट होने का एक और मुख्य लाभ यह है कि एक अच्छी तरह से डिज़ाइन की गई और जानकारीपूर्ण स्कूल वेबसाइट अन्य स्कूलों पर प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्राप्त करने के लिए एक मूल्यवान संपत्ति हो सकती है। अद्वितीय कार्यक्रमों को उजागर करके, छात्र उपलब्धियों को प्रदर्शित करके और घटनाओं और गतिविधियों पर नवीनतम जानकारी प्रदान करके, एक स्कूल वेबसाइट एक मजबूत ब्रांड बनाने और संभावित छात्रों और उनके अभिभावकों को आकर्षित करने में मदद कर सकती है।



स्कूल की वेबसाइट पर कौन से तत्व होने चाहिए?

























आपके स्कूल की वेबसाइट में 13 तत्व शामिल होने चाहिए

  1. · समाचार और घटनाओं की जानकारी
  2. · सभी गतिविधियों की अनुसूची
  3. · माता-पिता और छात्र समीक्षाएँ
  4. · परीक्षा कार्यक्रम और परिणाम
  5. · शैक्षिक कार्यक्रम
  6. · स्थान और संपर्क विवरण
  7. · पूछताद फ़ॉर्म
  8. · प्रवेश फार्म
  9. · ई-पुस्तकें अनुभाग
  10. · ऑनलाइन पाठ्यक्रम की पेशकश
  11. · विद्यालय के बारे में
  12. · चैट समर्थन
  13. · गोपनीयता नीति


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शुक्रवार, 17 दिसंबर 2021

5 Franchise Business जिन्हें कम लागत में शुरू कर की जा सकती है अच्छी कमाई

 














युवा आंत्रप्रेन्योर स्टार्टअप बिजनेस को लेकर काफी उत्साहित हैं क्योंकि स्टार्टअप बिजनेस देश की आर्थिक व्यवस्था को मजबूत भी करते हैं और साथ ही रोजगार के अवसर भी उत्पन्न करने में भी अहम भूमिका निभाते हैं. लेकिन आंत्रप्रेन्योर साथ ही कुछ ऐसे बिजनेस प्लान की तलाश भी करते हैं, जिन्हें कम लागत में शुरू किया जा सके. कम लागत के साथ ही जब अच्छे बिजनेस प्लान की बात होती है तो इनमें सबसे पहले फ्रेंचाइज़ी बिजनेस का नाम भी जरूर आता है.

भारत में ऐसे बहुत से फ्रेंचाइज़ी बिजनेस हैं, जिनकी शुरुआत केवल पांच से सात लाख तक के निवेश के साथ की जा सकती है. चलिए आज के इस लेख में हम आपको कुछ ऐसे ही फ्रेंचाइज़ी बिजनेस के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनकी शुरुआत आप कर सकते हैं और कमाई का अच्छा अवसर उत्पन्न कर सकते हैं.

1. लिटिल फ्लोरिस्ट फ्रेंचाइजी बिजनेस (Little Florist)

अगर आप फूलों से जुड़े किसी व्यापार को शुरू करना चाहते हैं तो आपको लिटिल फ्लोरिस्ट फ्रेंचाइज़ी का चुनाव जरूर करना चाहिए. लिटिल फ्लोरिस्ट भी ऐसे व्यापार में से एक है, जो लगातार तरक्की करने वाला व्यापार है और भारत में बड़ी ही तेज़ी से अपना विस्तार कर रहा है. लिटिस्ट फ्लोरिस्ट ऑनलाइन सर्विस भी उपलब्ध कराता है. यही कारण है कि यह बिजनेस काफी तेज़ी के साथ आगे बढ़ रहा है. लिटिल फ्लोरिस्ट की शुरुआत 1998 में हुई थी लेकिन इन्होंने फ्रेंचाइज़ी देने की शुरुआत 2013 में की. आप घर से ही इस व्यापार को शुरू कर सकते हैं. लिटिल फ्लोरिस्ट फ्रेंचाइज़ी को लेने के लिए आपको पांच से सात लाख तक की शुरुआती इनवेस्टमेंट करनी होगी. इसके साथ ही एक लाख तीस हजार रुपये इसकी रोयल्टी फीस निर्धारित की गई है.

2.फूड बिजनेस फ्रेंचाइज़ी (Food Business Franchise)

ऐसे कम ही बिजनेस होते हैं, जो सीजनल बिजनेस की लिस्ट में शुमार होते हैं. फूड बिजनेस ऐसा ही बिजनेस है, जिसका कोई सीजन नहीं होता है और इसे अगर अच्छी रिसर्च के बाद शुरू किया जाए तो इसमें व्यापारी को हमेशा ही मुनाफा होता है. फ्रेंचाइज़ी बिजनेस शुरू करने के लिए भी आपको किसी अच्छे फूड ब्रांड की फ्रेंचाइज़ी का चुनाव करना चाहिए. उदाहरण के तौर पर डोमिनोज़ पिज्ज़ा और बर्गर किंग की फ्रेंचाइज़ी लेकर इस बिजनेस की शुरुआत की जा सकती है. आपको बस संबंधित ब्रांड की साइट पर जाकर रिसर्च करनी होगी और फ्रेंचाइज़ी को लेकर सभी नियमों और शर्तों के बारे में आपको जानकारी प्राप्त करनी होगी.

3. बेक-एंड-शेक फ्रेंचाइज़ी बिजनेस (Bake-N-Shake)

बेकरी प्रोडक्ट्स लोगों की हमेशा ही पहली पसंद होते हैं. अगर आपको बेकरी प्रोडक्ट्स से जुड़ी अच्छी जानकारी है तो आप भी इस व्यापार का फ्रेंचाइज़ी के माध्यम से हिस्सा बन सकते हैं. बेक-एंड-शेक बेकरी प्रोडक्ट्स बनाने वाली एक ऐसी कंपनी है, जो अपने बिजनेस का विस्तार फ्रेंचाइज़ी के जरिए भी कर रही है. आप बेक-एंड-शेक की फ्रेंचाइज़ी को लेकर अपने घर से ही इस व्यापार का हिस्सा बन सकते हैं. भोपाल स्थित इस बेक-एंड-शेक की फ्रेंचाइज़ी लेने के लिए आपको पांच से सात लाख तक की इनवेस्टमेंट करनी पड़ सकती है. बेक-एंड-शेक, केक, पेस्ट्री के साथ ही सभी तरह के शेक्स और फास्ट फूड प्रोडक्ट्स भी उपलब्ध कराती है. इस फ्रेंचाइज़ी बिजनेस की मदद से आप घर बैठे ही अपनी आमदनी को कई गुना कर सकते हैं.

4. ऐजूकेशन बिजनेस फ्रेंचाइज़ी (Education Business Franchise)

ऐजूकेशन, प्राथमिक आवश्यकताओं में से एक है.  कोरोना के समय में जिस तरह से स्कूल और कॉलेज नहीं खुलने के कारण स्टूडेंट्स की पढ़ाई प्रभावित हुई है लेकिन ऑनलाइन ऐजूकेशन ने इस हानि को कम करने का काम भी किया है. आंत्रप्रेन्योर्स ऐजूकेशन बिजनेस की फ्रेंचाइज़ी (Best Franchise Business During Pandemic) लेकर भी अपने बिजनेस की शुरुआत कर सकते हैं. आप किसी भी स्कूल, कोचिंग सेंटर और ट्रेनिंग सेंटर को ओपन कर अपने बिजनेस की शुरुआत कर सकते हैं. ऐसे कई संस्थान है, जिनकी फ्रेंचाइज़ी पांच लाख तक के निवेश में ली जा सकती है. आपको यहाँ पर भी अच्छी रिसर्च का सहारा लेना होगा.

5. रिटेल बिजनेस फ्रेंचाइज़ी (Retail Business Franchise)

रिटेल बिजनेस को भी फ्रेंचाइज़ी बिजनेस का सबसे अच्छा विकल्प माना जाता है. यह भी ऐसा बिजनेस है, जिसकी शुरुआत सिर्फ पांच लाख तक के निवेश के साथ की जा सकती है. ऐसी बहुत सी एफएमसीजी कंपनियाँ और सुपरमार्केट मौजूद हैं, जो अपने बिजनेस को फ्रेंचाइज़ी के माध्यम से विस्तार देने का काम करती हैं. आप बाजार में रिसर्च कर किसी भी सुपर मार्केट या रिटेल बिजनेस का चुनाव कर फ्रेंचाइज़ी बिजनेस (Franchise Business in India) की शुरुआत कर सकते हैं. उदाहरण के तौर पर आप ईज़ी-डे या डिमार्ट जैसे ब्रांड की फ्रेंचाइज़ी लेकर बिजनेस का शुभारंभ कर सकते हैं.

स्टार्टअप बिजनेस का अगर आप विचार करते हैं तो फ्रेंचाइज़ी बिजनेस एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है. फ्रेंचाइज़ी बिजनेस में आपको ब्रांड की ओर से बिजनेस की सभी रणनीतियाँ और अच्छा प्लान भी मिलता है और साथ ही बिजनेस ट्रेनिंग भी दी जाती है. इसलिए फ्रेंचाइज़ी बिजनेस आपके लिए एक फायदे का बिजनेस है, जिसे आप कम निवेश में शुरू कर सकते हैं.

लेख के बारे में आप अपनी टिप्पणी को कमेंट सेक्शन में कमेंट करके दर्ज करा सकते हैं. इसके अलावा आप अगर एक व्यापारी हैं और अपने व्यापार में किन्ही जटिल और मुश्किल परेशानियों का सामना कर रहे हैं. आप चाहते हैं कि बिजनेस को आगे बढ़ाने में आपको एक पर्सनल बिजनेस कोच का अच्छा मार्गदर्शन मिले तो आपको Business Coaching Program का चुनाव जरूर करना चाहिए. इसके लिए आप अपने बिजनेस में एक अच्छी हैंडहोल्डिंग पा सकते हैं और अपने बिजनेस को चार गुना बढ़ा सकते हैं.


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बुधवार, 21 जुलाई 2021

30 साल की रानी 'अबक्का चौटा'

साल था 1555 जब पुर्तगाली सेना कालीकट, बीजापुर, दमन, मुंबई जीतते हुए गोवा को अपना हेडक्वार्टर बना चुकी थी। टक्कर में कोई ना पाकर उन्होंने पुराने कपिलेश्वर मंदिर को ध्वस्त कर उस पर चर्च स्थापित कर डाली।

मंगलौर का व्यवसायिक बंदरगाह अब उनका अगला निशाना था। उनकी बदकिस्मती थी कि वहाँ से सिर्फ 14 किलोमीटर पर 'उल्लाल' राज्य था जहां की शासक थी 30 साल की रानी 'अबक्का चौटा' (Abbakka Chowta).।

पुर्तगालियों ने रानी को हल्के में लेते हुए केवल कुछ सैनिक उसे पकडने भेजा। लेकिन उनमेंसे कोई वापस नहीं लौटा। क्रोधित पुर्तगालियों ने अब एडमिरल 'डॉम अल्वेरो ड-सिलवीरा' (Dom Álvaro da Silveira) के नेतृत्व में एक बड़ी सेना भेजी। शीघ्र ही जख्मी एडमिरल खाली हाथ वापस आ गया। इसके बाद पुर्तगालियों की तीसरी कोशिश भी बेकार साबित हुई।

चौथी बार में पुर्तगाल सेना ने मंगलौर बंदरगाह जीत लिया। सोच थी कि यहाँ से रानी का किला जीतना आसान होगा, और फिर उन्होंने यही किया। जनरल 'जाओ पिक्सीटो' (João Peixoto) बड़ी सेना के साथ उल्लाल जीतकर रानी को पकड़ने निकला।

लेकिन यह क्या..?? किला खाली था और रानी का कहीं अता-पता भी ना था। पुर्तगाली सेना हर्षोल्लास से बिना लड़े किला फतह समझ बैठी। वे जश्न में डूबे थे कि रानी अबक्का अपने चुनिंदा 200 जवान के साथ उनपर भूखे शेरो की भांति टूट पड़ी।

बिना लड़े जनरल व अधिकतर पुर्तगाली मारे गए। बाकी ने आत्मसमर्पण कर दिया। उसी रात रानी अबक्का ने मंगलौर पोर्ट पर हमला कर दिया जिसमें उसने पुर्तगाली चीफ को मारकर पोर्ट को मुक्त करा लिया।

अब आप अन्त जानने में उत्सुक होंगे..??

रानी अबक्का के देशद्रोही पति ने पुर्तगालियों से धन लेकर उसे पकड़वा दिया और जेल में रानी विद्रोह के दौरान मारी गई।

क्या आपने इस वीर रानी अबक्का चौटा के बारे में पहले कभी सुना या पढ़ा है..??  इस रानी के बारे में जो चार दशकों तक विदेशी आततायियों से वीरता के साथ लड़ती रही, हमारी पाठ्यपुस्तकें चुप हैं। अगर यही रानी अबक्का योरोप या अमेरिका में पैदा हुई होती तो उस पर पूरी की पूरी किताबें लिखी गई होती।

इस कहानी से दो बातें साफ हैं,,

हमें हमारे गौरवपूर्ण इतिहास से जानबूझ कर वन्चित रखा गया है। हमारी 1000 साल की दासता अपने ही देशवासियों (भितरघातियों) के विश्वासघात का नतीजा है। दुर्भाग्य से यह आज भी यथावत है,,,

स्त्रोत:- #Indian_Untold_histrory

रविवार, 11 जुलाई 2021

पुराणों व हिन्दू धर्मग्रंथों में उल्लेखित पर्यावरण ज्ञान

 पुराणों व हिन्दू धर्मग्रंथों में उल्लेखित पर्यावरण ज्ञान



👉 10 कुॅंओं के बराबर एक बावड़ी, 10 बावड़ियों के बराबर एक तालाब, 10 तालाब के बराबर 1 पुत्र एवं 10 पुत्रों के बराबर एक वृक्ष है।
👉 जीवन में लगाए गए वृक्ष अगले जन्म में संतान के रूप में प्राप्त होते हैं। (विष्णु धर्मसूत्र 19/4)
👉 जो व्यक्ति पीपल अथवा नीम अथवा बरगद का एक, चिंचिड़ी (इमली) के 10, कपित्थ अथवा बिल्व अथवा  ऑंवले के तीन और आम के पांच पेड़ लगाता है, वह *सब पापों से मुक्त हो जाता है। ( भविष्य पुराण)
👉 पौधारोपण करने वाले व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।
👉 शास्त्रों के अनुसार पीपल का पेड़ लगाने से संतान लाभ होता है।
👉 अशोक वृक्ष लगाने से शोक नहीं होता है।
👉 पाकड़ का वृक्ष लगाने से उत्तम ज्ञान प्राप्त होता है।
👉 बिल्वपत्र का वृक्ष लगाने से व्यक्ति दीर्घायु होता है।
👉 वट वृक्ष लगाने से मोक्ष मिलता है।
👉 आम वृक्ष लगाने से कामना सिद्ध होती है।
👉 कदम्ब का वृक्षारोपण करने से विपुल लक्ष्मी की प्राप्त होती है। प्राचीन भारतीय चिकित्सा- पद्धति के अनुसार पृथ्वी पर ऐसी कोई भी वनस्पति नहीं है, जो औषधि ना हो।

 स्कंद पुराण में एक सुंदर श्लोक है-

अश्वत्थमेकम् पिचुमन्दमेकम्
न्यग्रोधमेकम्  दश चिञ्चिणीकान्।
कपित्थबिल्वाऽऽमलकत्रयञ्च पञ्चाऽऽम्रमुप्त्वा नरकन्न पश्येत्।।

अश्वत्थः         =     पीपल (100% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
पिचुमन्दः      =     नीम (80% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
न्यग्रोधः         =     वटवृक्ष(80% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
चिञ्चिणी        =      इमली (80% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
कपित्थः        =       कविट (80% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
बिल्वः           =      बेल (85% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
आमलकः      =     आँवला (74% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
आम्रः            =     आम (70% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
                            (उप्ति = पौधा लगाना)

        अर्थात्- जो कोई इन वृक्षों के पौधों का रोपण करेगा, उनकी देखभाल करेगा उसे नरक के दर्शन नही करना पड़ेंगे।

       इस सीख का अनुसरण न करने के कारण हमें आज इस परिस्थिति के स्वरूप में नरक के दर्शन हो रहे हैं। 
अभी भी कुछ बिगड़ा नही है, हम अभी भी अपनी गलती सुधार सकते हैं।
औऱ
  • गुलमोहर, निलगिरी- जैसे वृक्ष अपने देश के पर्यावरण के लिए घातक हैं।
  • पश्चिमी देशों का अंधानुकरण कर हम ने अपना बड़ा नुकसान कर लिया है।
  • पीपल, बड और नीम जैसे वृक्ष रोपना बंद होने से सूखे की समस्या बढ़ रही है
  • ये सारे वृक्ष वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाते है साथ ही धरती के तापनाम को भी कम करते है।
          हमने इन वृक्षों के पूजने की परंपरा को अन्धविश्वास मानकर  फटाफट संस्कृति के चक्कर में इन वृक्षों से दूरी बनाकर  यूकेलिप्टस (नीलगिरी) के वृक्ष सड़क के दोनों ओर लगाने की शुरूआत की।  यूकेलिप्टस झट से बढ़ते है लेकिन  ये वृक्ष दलदली जमीन को सुखाने के लिए लगाए जाते हैं। इन वृक्षों से धरती का जलस्तर घट जाता है। विगत ४० वर्षों में नीलगिरी के वृक्षों को बहुतायात में लगा कर पर्यावरण की हानि की गई है।

शास्त्रों में पीपल को वृक्षों का राजा कहा गया है। 

मूले ब्रह्मा त्वचा विष्णु शाखा शंकरमेवच।
पत्रे पत्रे सर्वदेवायाम् वृक्ष राज्ञो नमोस्तुते।।

भावार्थ-जिस वृक्ष की जड़ में ब्रह्मा जी तने पर श्री हरि विष्णु जी एवं शाखाओं पर देव आदि देव महादेव भगवान शंकर जी का निवास है और उस वृक्ष के पत्ते पत्ते पर सभी देवताओं का वास है ऐसे वृक्षों के राजा पीपल को नमस्कार है।।
    
आगामी वर्षों में प्रत्येक ५०० मीटर के अंतर पर यदि एक एक पीपल, बड़ , नीम आदि का वृक्षारोपण किया जाएगा, तभी अपना भारत देश प्रदूषणमुक्त होगा। 

घरों में तुलसी के पौधे लगाना होंगे।

          हम अपने संगठित प्रयासों से ही अपने "भारत" को नैसर्गिक आपदा से बचा सकते है।

        भविष्य में भरपूर मात्रा में नैसर्गिक ऑक्सीजन मिले इसके लिए आज से ही अभियान आरंभ करने की आवश्यकता है।

         आइए हम पीपल, बड़, बेल, नीम, आंवला एवं आम आदि वृक्षों को लगाकर आने वाली पीढ़ी को निरोगी एवं "सुजलां सुफलां पर्यावरण"  देने का प्रयत्न करे।

शनिवार, 12 जनवरी 2019

यू कैन हील योर लाइफ

यू कैन हील योर लाइफ



प्रकाशक : प्रभात प्रकाशनप्रकाशित वर्ष : 2009
पृष्ठ :223
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 7494
आईएसबीएन :   9788173156809



You Can Heal Your Life (Hindi) by [Hay, Louise L]

इस पुस्तक में सबकुछ है- जीवन, उसके मूल्य और अपने आप पर कैसे स्वाध्याय करें...

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

यू कैन हील योर लाइफ–इस अद्भुत पुस्तक के माध्यम से लुइस एल हे आत्मविकास की यात्रा को पाठकों के साथ बाँट रही हैं। उनका कहना है कि हमारा जीवन कितना भी निम्न स्तरीय क्यों न रहा हो, हम अपने जीवन को पूरी तरह बदलकर उसे और ज्यादा बेहतर बना सकते हैं।

इस पुस्तक में सबकुछ है–जीवन, उसके मूल्य और अपने आप पर कैसे स्वाध्याय करें। अपने बारे में आपको जो भी जानने की आवश्यकता है, वह सब इसमें हैं। इसमें रोग के संभावित मानसिक कारणों की संदर्भ मार्गदर्शिका है, जो वास्तव में उल्लेखनीय और अनूठी है। किसी निर्जन द्वीप पर कोई व्यक्ति इस पुस्तक को पा जाए तो वह अपने जीवन को बेहतरीन बनाने के लिए जो भी जानना चाहता है, वह सब इससे सीख-समझ सकता है।

प्रत्येक अध्याय एक निश्चय के साथ आरंभ होता है और सभी अध्याय एक उपचार के साथ समाप्त होते हैं। जब आप इससे संबंधित जीवन के भाग पर कार्य करेंगे तो प्रत्येक अध्याय उपयोगी सिद्ध होगा। यह चेतन को परिवर्तित करने के लिए तैयार सकारात्मक विचारों का प्रवाह है।

यदि आप पुस्तक के क्रमानुसार दिए गए अभ्यास निष्ठापूर्वक करेंगे तो पुस्तक के समाप्त होने तक निश्चय ही अपने जीवन में परिवर्तन महसूस कर रहे होंगे।
विश्व की सर्वाधिक बिक्रीवाली पुस्तकों में शामिल। 

1. जिसमें मुझे विश्वास है

‘बुद्धि और ज्ञान के द्वार हमेशा खुले रहते हैं।’
जीवन वास्तव में बहुत सरल है। जो हम देते हैं, वही हमें वापस मिलता है
जो कुछ हम अपने विषय में सोचते हैं, वह हमारे लिए सच हो जाता है। मैं मानती हूँ कि हर व्यक्ति, जिनमें मैं भी शामिल हूँ, अपने जीवन में हर अच्छी या बुरी चीज के लिए स्वयं जिम्मेदार है। हमारे मस्तिष्क में आनेवाला हर विचार हमारा भविष्य बनाता है। हममें से हर व्यक्ति अपने विचारों और अपनी भावनाओं द्वारा अपने अनुभवों को जन्म देता है। हमारे विचार, जो हम बोलते हैं, वह सब हमारा अनुभव बन जाता है।

हम खुद परिस्थितियों को जन्म देते हैं और फिर अपनी कुंठा के लिए किसी दूसरे व्यक्ति को दोषी ठहराते हुए अपनी ऊर्जा नष्ट करते हैं। कोई व्यक्ति, कोई स्थान और कोई चीज हमसे अधिक शक्तिशाली नहीं है, क्योंकि अपने मस्तिष्क में केवल ‘हम’ ही सोचते हैं। जब हम अपने मस्तिष्क में शांति, तालमेल और संतुलन बना लेते हैं तो यह सब हमारे जीवन में भी आ जाता है।

इनमें से कौन सा कथन आपके विचार से मिलता है ?
–लोग मेरे पीछे पड़े हैं।
–हर व्यक्ति हमेशा मेरी मदद करता है।
इनमें से प्रत्येक बिलकुल भिन्न अनुभव को जन्म देगा। हम अपने बारे में और जीवन के बारे में जो भी मानते हैं, वह हमारे लिए सच हो जाता है।

हम जो भी सोचना या मानना चाहते हैं, हर विचार से ब्रह्मांड हमारे साथ होता है
दूसरे रूप में, हम जो भी स्वीकार करते हैं, हमारा अवचेतन मन उसे स्वीकार कर लेता है। इन दोनों का अर्थ है कि मैं अपने और जीवन के बारे में जो भी स्वीकारता हूँ, वह मेरे लिए एक सच्चाई बन जाता है। आप अपने और जीवन के बारे में जो भी सोचते हैं, वह आपके लिए सच हो जाता है। हमारे पास सोचने के लिए असीमित विकल्प होते हैं।
जब हम यह जान जाते हैं तो ‘लोग मेरे पीछे पड़े हैं’ की अपेक्षा ‘हर कोई हमेशा मेरी मदद करना चाहता है’ का विकल्प चुनना सही होगा।

शाश्वत शक्ति कभी हमारा मूल्यांकन या हमारी आलोचना नहीं करती
वह केवल हमारे मूल्यों पर हमें स्वीकार करती है। फिर वह हमारे विचारों को हमारे जीवन में प्रतिबिंबित करती है। यदि मैं मानना चाहती हूँ कि मेरा जीवन बहुत एकाकी है और कोई मुझसे प्रेम नहीं करता, तो मुझे दुनिया में यही मिलेगा।
लेकिन यदि मैं उस विचार को छोड़ने के लिए तैयार हूँ और अपने लिए दृढ़ता से यह कहूँ कि ‘प्रेम हर जगह है और मैं प्रेम करने व प्रेम पाने योग्य हूँ,’ और इस नए विचार पर कायम रहूँ तथा उसे बार-बार स्वीकार करूँ तो यह मेरे लिए सच हो जाएगा। अब मुझसे प्रेम करनेवाले लोग मेरे जीवन में आएँगे, पहले से मौजूद लोग मेरे प्रति अधिक प्रेम रखेंगे और मैं दूसरे के प्रति आसानी से प्रेम की अभिव्यक्ति कर पाऊँगी।

हममें से अधिकतर लोग ‘हम कौन हैं’ के बारे में मूर्खतापूर्ण विचार रखते हैं और जीवन जीने के लिए बहुत से कठोर नियम बनाते हैं
यह हमें दोषी ठहराने के लिए नहीं है, क्योंकि हममें से हर कोई इस क्षण में जितना अच्छा कर सकता है, कर रहा है। यदि हम बेहतर जानते और हमारे पास अधिक समझ एवं सजगता होती तो हम उसे अलग तरीके से करते। कृपया अपनी स्थिति के लिए अपने आपको निचले स्तर पर न रखें। आपने यह पुस्तक उठाई और मुझे खोज निकाला, इसके अर्थ है कि आप अपने जीवन में एक नया, सकारात्मक परिवर्तन लाना चाहते हैं। इसके लिए अपने आपको धन्यवाद दें। ‘पुरुष रोते नहीं !’ ‘महिलाएँ पैसा नहीं सँभाल सकतीं !’ जीवन के लिए कितने संकुचित विचार हैं ये !

जब हम बहुत छोटे होते हैं तो अपने तथा जीवन के बारे में महसूस करना हम अपने आस-पास के बड़ों की प्रतिक्रियाओं से सीखते हैं
इस प्रकार हम अपने तथा अपनी दुनिया के विषय में सोचना सीखते हैं। अब यदि आप ऐसे लोग साथ रहें हैं, जो बहुत दुःखी भयभीत, अपराध-बोध से ग्रस्त या क्रुद्ध थे तो आपने अपने बारे में और अपनी दुनिया के बारे में बहुत सी नकारात्मक बातें सीखीं।
‘मैं कभी भी सही नहीं करता’, ‘यह मेरी गलती है’, ‘यदि मुझे गुस्सा आता है तो मैं एक बुरी व्यक्ति हूँ।’
इस तरह के विचार एक निराशाजनक जीवन को जन्म देते हैं।

जब हम बड़े हो जाते हैं तो अपनी प्रवृत्ति के अनुसार प्रारंभिक जीवन के भावनात्मक वातावरण का पुनःसर्जन करते हैं
यह अच्छा है या बुरा, सही है या गलत; यह वही होता है, जिसे हम अपने अंदर ‘घर’ के रूप में जानते हैं। साथ ही, हम अपने व्यक्तिगत संबंधों में उन संबंधों को फिर से जीवित करने के प्रयास करते हैं, जो संबंध हमारा अपने माँ या पिता के साथ या उनके बीच था। सोचिए कि कितनी बार आपका प्रेमी या बॉस बिलकुल आपकी माँ या आपके पित की तरह था।
हम अपने साथ वैसा ही व्यवहार करते हैं, जो हमारे माता-पिता हमारे साथ करते थे। हम उसी तरीके से स्वयं को डाँटते और सजा देते हैं। जब आप सुनते हैं तो लगभग उन शब्दों को सुन सकते हैं। एक बच्चे के रूप में जिस तरह हमें प्यार दिया गया था या प्रोत्साहित किया गया था, हम उसी तरीके से खुद को प्यार या प्रोत्साहित करते हैं।

‘तुम कभी कुछ ठीक नहीं करते।’ ‘यह सब तुम्हारी गलती है।’ आपने स्वयं से कितनी बार ऐसा कहा ?
‘तुम लाजवाब हो।’ ‘मैं तुम्हें प्यार करता हूँ।’ आप कितनी बार खुद से ऐसा कहते हैं ?
फिर भी, इसके लिए हम अपने माता-पिता को दोषी नहीं ठहराएँगे

हम सभी पीड़ितों द्वारा पीड़ित हैं, और शायद वे हमें कुछ ऐसा नहीं सिखा पाते जो वे नहीं जानते थे। यदि आपकी माँ नहीं जानती थीं कि अपने आपसे प्यार कैसे करना है या आपके पिता नहीं जानते थे कि वह आपसे प्यार कैसे करें, तो उनके लिए आपको खुद से प्यार करना सिखाना असंभव था।

वे अपने बचपन में मिली शिक्षा के अनुसार सबकुछ अच्छा कर रहे थे। यदि आप अपने माता-पिता को अधिक समझना चाहते हैं तो उन्हें अपने बचपन के बारे में बताने के लिए प्रेरित कीजिए और यदि आप संवेदना के साथ सुनें तो आपको पता चलेगा कि उनकी शंकाएँ और सख्ती कहाँ से आई हैं। जिन लोगों ने ‘आपके साथ वह सब किया’, वे आपकी तरह ही भयभीत और सहमे हुए थे
मैं ऐसा मानती हूँ कि हम स्वयं अपने माता-पिता का चुनाव करते हैं

हममें से हर कोई इस धरती पर एक सुनिश्चित समय और स्थान पर जन्म लेता है। हम यहाँ पर विशेष पाठ पढ़ने के लिए आए हैं, जो हमें आध्यात्मिक विकास के पथ पर आगे बढ़ाएगा। हम अपनी लिंग, अपना रंग, अपना देश चुनते हैं और फिर हम किसी खास माता-पिता को खोजते हैं, जो उस स्वरूप को प्रतिबिंबित करेंगे, जिस पर हम इस जीवन में काम करना चाहते हैं। फिर जब हम बड़े होते हैं तो आम तौर पर अपने माता-पिता पर उँगली उठाते हैं और रिरियाते हुए शिकायत करते हैं, ‘आपने मेरे साथ ऐसा किया।’ लेकिन वास्तव में हमने उन्हें इसलिए चुना, क्योंकि वे हमारे कार्यों के लिए बिलकुल उपयुक्त थे।

हमारे बचपन में ही हमारी आस्थाएँ स्थापित होती हैं और फिर उन्हीं आस्थाओं का अनुभव करते हुए जीवन में आगे बढ़ते हैं। अपने जीवन में पीछे की ओर देखिए और ध्यान दीजिए कि कितनी बार आप उसी अनुभव से गुजरे हैं। मेरा मानना है कि आपने उन अनुभवों को एक के बाद एक स्वयं बनाया, क्योंकि वे आपके अपने विश्वास को प्रतिबिंबित कर रहे थे। यह कोई मायने नहीं रखता कि हमें कितने लंबे समय से कोई समस्या थी, या वह कितनी बड़ी है या वह हमारे जीवन के लिए कितनी घातक है।
वर्तमान सबसे अधिक शक्तिशाली होती है

आज तक जीवन में आपने जिन घटनाओं का अनुभव किया है, वे सभी आपके अतीत से जुड़े विचारों और आस्थाओं से बने हैं। वे उन विचारों और शब्दों से बने थे, जिन्हें आपने कल, पिछले सप्ताह, पिछले माह, पिछले वर्ष, आपकी आयु के अनुसार 10, 20, 30, 40 या इससे अधिक वर्षों के दौरान इस्तेमाल किया था।

फिर भी, वह आपकी अतीत है। वह बीत चुका है। इस पल में महत्त्वपूर्ण यह है कि आप अभी क्या सोचना, विश्वास करना व कहना चाहते हैं, क्योंकि ये विचार और शब्द आपका भविष्य निर्धारित करेंगे। वर्तमान क्षण ही आपकी ताकत हैं और यही आपके कल, अगले सप्ताह, अगले माह, अगले वर्ष और आगे के अनुभवों का आधार हैं।
आप ध्यान दे सकते हैं कि इस क्षण में आप क्या सोच रहे हैं। वह नकारात्मक है या सकारात्मक है ? क्या आप चाहते हैं कि यह विचार आपका भविष्य तय करे ? बस ध्यान दें और सजग हो जाएँ।

रविवार, 18 मार्च 2018

''हरी नाम सदा सुखकारी''


 भगवन श्री कृष्णा के नामो और उनके नाम स्मरण के महत्त्व के बारे में हमारे इस आर्टिकल को पूरा पढ़े जिसके पड़ने मात्र से आपको असीम सुख की प्राप्ति होगी और भगवन का नाम स्मरण भी होगा जिससे आपके दुःख  नष्ट होंगे और निश्चित ही पुण्य का उदय होगा, ईश्वर आपका कल्याण करे 

गोविन्द माधव मुकुन्द हरे मुरारे,
शम्भो शिवेश शशिशेखर शूलपाणे।
दामोदराच्युत जनार्दन वासुदेव,
त्याज्या भटा य इति संततमामनन्ति।।
स्कन्दपुराण में यमराज नाममहिमाके विषय में कहते हैं–’जो गोविन्द, माधव, मुकुन्द, हरे, मुरारे, शम्भो, शिव, ईशान, चन्द्रशेखर, शूलपाणि, दामोदर, अच्युत, जनार्दन, वासुदेव–इस प्रकार सदा उच्चारण करते हैं, उनको मेरे प्रिय दूतो ! तुम दूर से ही त्याग देना।’
यदि जगत् का मंगल करने वाला श्रीकृष्ण-नाम कण्ठ के सिंहासन को स्वीकार कर लेता है तो यमपुरी का स्वामी उस कृष्णभक्त के सामने क्या है? अथवा यमराज के दूतों की क्या हस्ती है?

भगवन्नाम


भगवान का नाम उन परमात्मा का वाचक है जो अखिल ब्रह्माण्ड के नायक, परिचालक, उत्पादक और संहारक हैं। ‘भगवान’ शब्द समस्त ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य का संकेत करता है। अत: भगवान में अनन्त ब्रह्माण्डों के अनन्त जीवों का ज्ञान, उनके अनन्तानन्त कर्मों का ज्ञान, अनन्तानन्त कर्मों के फलों का ज्ञान और उन कर्मफलों को देने की सामर्थ्य है। वे भगवान एक ही हैं; किन्तु उन्हें ब्रह्मा, विष्णु, महेश, प्रजापति, इन्द्र, वरुण, अग्नि, राम, कृष्ण, गोविन्द, वासुदेव, नारायण आदि विभिन्न नामों से सम्बोधित किया जाता है। नाम-संकीर्तन उस परमपिता के प्रति अभिवादन है, उसके अमित उपकारों की स्वीकारोक्ति है और उसके प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन है। यह दीनता का प्रदर्शन है, गरीब की गुहार है और शरणागतभाव की अभिव्यक्ति है। यह समय का सदुपयोग है जिसमें भक्त स्वयं को समर्पण कर अपने अहंकार को नकारता है। भगवन्नाम शब्द में विलक्षण शक्ति है। जिस प्रकार किसी व्यक्ति का नाम लेने पर वही आता है; ठीक उसी तरह भगवन्नाम उच्चारण करने पर तीक्ष्ण तीर की तरह लक्ष्यभेद करता हुआ वह सीधे भगवान के हृदय पर प्रभाव करता है जिसके फलस्वरूप मनुष्य भगवत्कृपा का भाजन बनता है और उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

कलजुग केवल नाम अधारा

गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है–’कलजुग केवल नाम अधारा’
कलिजुग केवल हरि गुन गाहा।
गावत नर पावहिं भव थाहा।।
कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना।
एक अधार राम गुन गाना।।
‘सत्ययुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ के द्वारा और द्वापर में परिचर्या के द्वारा जो परम वस्तु प्राप्त होती है, कलियुग में केवल हरिनाम-संकीर्तन से उसकी प्राप्ति होती है।’ विष्णुपुराण के अनुसार–’कलौ संकीर्त्य केशवम्।’ कलियुग में भगवान श्रीकृष्ण के कीर्तन को प्रधानता दी गई है। कलियुग में तो संसार-सागर से पार उतरने के लिए एकमात्र भगवान का नाम ही सुदृढ़ नौका है। लगन हो, रटन हो और नाम पर विश्वास हो तो इस नाम-जप के प्रभाव से सब कुछ हो सकता है।

भगवान के नामोच्चारण की महिमा

भगवान के नाम की विलक्षण महिमा है। इस भगवन्नाम से जल में डूबता हुआ गजराज समस्त शोक से छूट गया, द्रौपदी का वस्त्र अनन्त हो गया, नरसीमेहता के सम्पूर्ण कार्य बिना किसी उद्योग के सिद्ध हो गए, नाम के स्पर्श से सेतुबंधन के समय पत्थर भी तैर गए, मीरा के लिए विष भी अमृत समान हो गया, अवढरदानी शिवजी भी नाम के प्रताप से भयानक विषपान कर गए और नीलकण्ठ बन गए और संसार को भस्मीभूत होने से बचा लिया, व्याध भी ‘राम’ का उल्टा ‘मरा’ जपकर वाल्मीकि बन गए, भक्त प्रह्लाद भी हिरण्यकशिपु द्वारा दी गई समस्त विपत्तियों से छूट गए और धधकती हुई ज्वाला भी उन्हें  भस्म नहीं कर सकी, बालक ध्रुव को अविचल पदवी प्राप्त हुई, नामजप के प्रभाव से ही हनुमानजी ने श्रीराम को अपना ऋणी बना लिया, अंतकाल में पुत्र का नाम नारायण लेने से अजामिल को भगवत्-पद की प्राप्ति हुई, नाम के प्रभाव से ही असंख्य साधकों को चमत्कारमयी सिद्धियां प्राप्त हुईं–ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो भगवान के नाम की महिमा को दर्शाते हैं।
नामोच्चार संसार के रोगों के निवारण की महान औषधि है। जैसे जलती हुई अग्नि को शान्त करने में जल सर्वोपरि साधन है, घोर अन्धकार को नष्ट करने के लिए सूर्य ही समर्थ है, वैसे दम्भ, कपट, मद, मत्सर आदि अनन्त दोषों को नष्ट करने के लिए श्रीभगवन्नाम ही सर्वसमर्थ है। बारम्बार नामोच्चारण करने से जिह्वा पवित्र हो जाती है। मन को अत्यन्त प्रसन्नता होती है। समस्त इन्द्रियों को सच्चिदानंदमय परम सुख प्राप्त होता है। समस्त शोक-संताप नष्ट हो जाते हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार–’भगवान का नाम प्रेम से, बिना प्रेम से, किसी संकेत के रूप में, हंसी-मजाक करते हुए, किसी डांट-फटकार लगाने में अथवा अपमान के रूप में भी ग्रहण करने से मनुष्य के सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं।’
रामचरितमानस में कहा गया है–’भाव कुभाव अनख आलसहुँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहुँ।।’ भगवान का नाम लेकर जो जम्हाई भी लेता है उसके समस्त पाप भस्मीभूत हो जाते हैं। यथा–’राम राम कहि जै जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं।।
भगवन्नाम से तो बड़े-बड़े अमंगल ही क्या, भाग्य में लिखे हुए अनिष्टकारी योग भी मिट जाते हैं। तीर्थ में वास, लक्ष-लक्ष गोदान अथवा कोटि जन्म के सुकृत–कुछ भी भगवन्नाम के तुल्य नहीं है। नाम की सामर्थ्य असीम है, अचिन्तनीय है।
भक्त नामदेव का कहना है कि–’सोने के पर्वत, हाथी और घोड़े का दान तथा करोड़ों गायों का दान नाम के समान नहीं। ऐसा नाम अपनी जीभ पर रखो, जिससे जरा और मृत्यु पुन: न हो।’

प्रश्न यह उठता है कि नाम में इतनी शक्ति आयी कहां से? 


भगवान मनुष्यों पर अनुग्रह करने के लिए युग-युग में अवतार लेते हैं। अपने परिकरों के साथ आते हैं और कार्य हो जाने पर अपने गणों के साथ नित्यधाम को लौट जाते हैं। दु:खी जीवों के लिए वे छोड़ जाते हैं अपना अभय और अमृतप्रद नाम-चिन्तामणि। केवल यही नहीं, नाम के भीतर वे अपनी भारी शक्ति का आधान कर जाते हैं। नाम की शक्ति तो थी ही, प्रभु की शक्ति को पाकर नाम नामी (भगवान) की अपेक्षा महान बन जाता है। श्रीरामचन्द्रजी ने एक पाषाणमयी अहल्या का उद्धार किया था पर नाम युग-युग में शत-शत अहल्याओं का उद्धार करता है। अब इतनी अहल्या हैं कहां? तो इसका उत्तर है–’हल्या’ का अर्थ है कृषियोग्य; अहल्या का अर्थ है कृषि के अयोग्य अर्थात् पाषाण। सभ्यता के विकास के साथ मनुष्य का हृदय पाषाण होता जा रहा है। भगवान तो प्रकट हैं नहीं जो उनका उद्धार करें। परन्तु उनका नाम तो है ही। भगवान तो उद्धार करके चले गए, नाम इस समय महान उद्धारलीला करके (अनेकों पाषाणहृदयों को द्रवित करके) शत-शत जीवों का उद्धार कर रहा है।

भगवान श्रीकृष्ण के नाम की महिमा से सम्बन्धित कुछ सुन्दर प्रसंग

प्राचीन कथाओं पर विश्वास करना यद्यपि कठिन होता है परन्तु भक्ति हृदय से (श्रद्धा और विश्वास से) की जाती है, तर्क से नहीं। प्रस्तुत हैं भगवन्नाम की महिमा से सम्बन्धित कुछ प्रसंग–
एक बार भगवती पार्वती ने भगवान शंकर से कहा–’देव ! आज किसी भक्त श्रेष्ठ का दर्शन कराने की कृपा करें।’ भगवान शंकर तत्काल उठ खड़े हुए और कहा–’जीवन के वही क्षण सार्थक हैं जो भगवान के भक्तों के सांनिध्य में व्यतीत हों।’ भगवान शंकर पार्वतीजी को वृषभ पर बैठाकर चल दिए। पार्वतीजी ने पूछा–’हम कहां चल रहे हैं?’ शंकरजी ने कहा–’हस्तिनापुर चलेंगे। जिनके रथ का सारथि बनना श्रीकृष्ण ने स्वीकार किया, उन महाभाग अर्जुन के अतिरिक्त श्रेष्ठ भक्त पृथ्वी पर और कौन हो सकता है।’ किन्तु हस्तिनापुर में अर्जुन के भवन के द्वार पर पहुँचने पर पता लगा कि अर्जुन सो रहे हैं। पार्वतीजी को भक्त का दर्शन करने की जल्दी थी पर शंकरजी अर्जुन की निद्रा में विघ्न डालना नहीं चाहते थे। उन्होंने श्रीकृष्ण का स्मरण किया। तत्काल ही श्रीकृष्ण, उद्धवजी, रुक्मिणीजी और सत्यभामाजी के साथ पधारे और शंकर-पार्वतीजी को प्रणाम कर आने का कारण पूछा।
शंकरजी ने कहा–’आप भीतर जाकर अपने सखा को जगा दें, क्योंकि पार्वतीजी अर्जुन के दर्शन करना चाहती हैं।’ ‘जैसी आज्ञा’ कहकर श्रीकृष्ण अंदर चले गए। बहुत देर हो गयी पर अंदर से कोई संदेश नहीं आया तब शंकरजी ने ब्रह्माजी का स्मरण किया। ब्रह्माजी के आने पर शंकरजी ने उन्हें अर्जुन के कक्ष में भेजा। पर ब्रह्माजी के अंदर जाने पर भी बहुत देर तक कोई संदेश नहीं आया। शंकरजी ने नारदजी का स्मरण किया। शंकरजी की आज्ञा से नारदजी अंदर गए। किन्तु संदेश तो दूर, कक्ष से वीणा की झंकार सुनाई देने लगी। पार्वतीजी से रहा नहीं गया। वे बोलीं–’यहां तो जो आता है, वहीं का हो जाता है। पता नहीं वहां क्या हो रहा है? आइये, अब हम स्वयं चलते हैं।’ भगवान शंकर पार्वतीजी के साथ अर्जुन के कक्ष में पहुँचे।
उधर श्रीकृष्ण जब अर्जुन के कक्ष में पहुँचे तब अर्जुन सो रहे थे और उनके सिरहाने बैठी सुभद्राजी उन्हें पंखा झल रही थीं। अपने भाई (श्रीकृष्ण) को आया देखकर वे खड़ी हो गईं और सत्यभामाजी पंखा झलने लगीं। उद्धवजी भी पंखा झलने लगे। रुक्मिणीजी अर्जुन के पैर दबाने लगीं। तभी उद्धवजी व सत्यभामाजी चकित होकर एक-दूसरे को देखने लगे। श्रीकृष्ण ने पूछा–’क्या बात है?’ तब उद्धवजी ने उत्तर दिया–’धन्य हैं ये कुन्तीनन्दन ! निद्रा में भी इनके रोम-रोम से ‘श्रीकृष्ण-श्रीकृष्ण’ की ध्वनि निकल रही है।’ तभी रुक्मिणीजी बोलीं–’वह तो इनके चरणों से भी निकल रही है।’
अर्जुन के शरीर से निकलती अपने नाम की ध्वनि जब श्रीकृष्ण के कान में पड़ी तो प्रेमविह्वल होकर भक्तवत्सल भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अर्जुन के चरण दबाने बैठ गए। भगवान श्रीकृष्ण के नवनीत से भी सुकुमार हाथों के स्पर्श से अर्जुन की निद्रा और भी प्रगाढ़ हो गयी।

उसी समय ब्रह्माजी ने कक्ष में प्रवेश किया और यह दृश्य, कि भक्त सो रहा है और उसके रोम-रोम से ‘श्रीकृष्ण’ की मधुर ध्वनि निकल रही है और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण अपनी पत्नी रुक्मिणीजी के साथ उसके चरण दबा रहे हैं, ब्रह्माजी भावविह्वल हो गए और अपने चारों मुखों से वेद की स्तुति करने लगे। इसे देखकर देवर्षि नारद भी वीणा बजाकर संकीर्तन करने लगे। भगवान शंकर व माता पार्वती भी इस अलौकिक दिव्य-प्रेम को देखकर प्रेम के अपार सिन्धु में निमग्न हो गए। शंकरजी का डमरू भी डिमडिम निनाद करने लगा और वे नृत्य करने लगे। पार्वतीजी भी स्वर मिलाकर हरिगुणगान करने लगीं।
इस तरह सच्चे भक्त के अलौकिक दिव्य-प्रेम ने भगवान को भी भावविह्वल कर दिया।
जहाँ कहीं और कभी भी शुद्ध हृदय से  कृष्ण नाम का उच्चारण होता है वहाँ-वहाँ स्वयं कृष्ण अपने को व्यक्त करते हैं। नाम और कृष्ण अभिन्न हैं।
कौरवों की सभा में जब द्रौपदी निरावरण हुई तब द्रौपदी ने बारम्बार ‘गोविन्द’ और ‘कृष्ण’ का नाम लेकर पुकारा और आपत्तिकाल में अभय देने वाले भगवान श्रीकृष्ण का मन-ही-मन चिन्तन किया। वह बोली–
गोविन्द द्वारकावासिन् कृष्ण गोपीजनप्रिय।
कौरवै: परिभूतां मां किं न जानासि केशव।।
हे नाथ हे रमानाथ व्रजनाथार्तिनाशन।
कौरवार्णवमग्नां मामुद्धरस्व जनार्दन।।
कृष्ण कृष्ण महायोगिन् विश्वात्मन् विश्वभावन।
प्रपन्नां पाहि गोविन्द कुरुमध्येऽवसीदतीम्।।
अर्थात्–’ हे गोविन्द ! हे द्वारकावासी श्रीकृष्ण ! हे गोपियों के प्राणबल्लभ ! हे केशव ! कौरव मेरा अपमान कर रहे हैं, इस बात को क्या आप नहीं जानते? हे नाथ ! हे लक्ष्मीनाथ ! हे व्रजनाथ ! हे संकट-नाशन जनार्दन ! मैं कौरवरूप समुद्र में डूबी जा रही हूँ; मेरा उद्धार कीजिए ! हे सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण ! महायोगिन् ! विश्वात्मन् ! विश्वभावन ! गोविन्द ! कौरवों के बीच कष्ट में पड़ी हुई मुझ शरणागत अबला की रक्षा कीजिए।’
द्रौपदी की करुण प्रार्थना सुनकर कृपालु श्रीकृष्ण गद्गद् हो गए तथा शय्या और आसन छोड़कर दया से द्रवित होकर पैदल ही दौड़ चले। धर्मस्वरूप भगवान श्रीकृष्ण ने वहां पधारकर अव्यक्तरूप से द्रौपदी की साड़ी में प्रवेश किया और भांति-भांति की सुन्दर साड़ी से द्रौपदी को ढक दिया। इस तरह वस्त्र के रूप में भगवान वहां तुरंत आ पहुँचे।
भगवान के नाम की महिमा दर्शाने वाली एक और कथा जो कि बताती है कि भगवान्नाम के फलस्वरूप ही श्रीराधाजी का प्राकट्य हुआ–
ब्रह्माण्डपुराण के उत्तरखण्ड के छठे अध्याय में कात्यायनीदेवी द्वारा श्रीबृषभानु को वर देने की कथा है–
बृषभानु संतानहीन होने के कारण बड़ा दु:खी जीवन बिता रहे थे। तब उनकी पत्नी ने उनसे मां कात्यायनी देवी की आराधना करने के लिए कहा। श्रीबृषभानुजी के कठोर तपस्या करने पर वाग्देवी (सरस्वतीजी) ने आकाशवाणी के द्वारा उन्हें आदेश दिया–
हरिनाम विना वत्स वर्णशुद्धिर्न जायते।
‘वत्स ! हरिनाम के बिना व्रण-शुद्धि नहीं होगी। अतएव राजन् ! हरिनाम का कीर्तन ही कल्याणकारी है। तुम पवित्र हरिनामों को ही क्रम से ग्रहण करो।’
उन्हीं के निर्देश से क्रतुमुनि के द्वारा बृषभानु को हरिनाम प्राप्त हुआ। वह नाम इस प्रकार था–
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।
श्रीबृषभानुजी की तपस्या और इस नाम-जप से प्रसन्न होकर कात्यायनी देवी उनके सामने प्रकट हो गयीं और उन्होंने श्रीबृषभानुजी से वर मांगने के लिए कहा। यद्यपि श्रीबृषभानुजी ने संतान-प्राप्ति की कामना से साधना आरम्भ की थी तथापि वे कात्यायनी देवी से बोले–’आपके दर्शन से ही मेरे सारे अभीष्ट पूर्ण हो गए।’ पर कात्यायनी देवी ने उनके पूर्ण अभीष्ट और कामना की पूर्ति के लिए उनको एक ज्योतिर्मय डिम्ब दिया। उसी से श्रीराधा का प्राकट्य हुआ। इस प्रकार ‘नाम’ के फलस्वरूप श्रीबृषभानुजी ने संतान प्राप्त की।
पावन ब्रजभूमि में आज भी चारों और ढोलक, मंजीरों की गूंज पर नाम-संकीर्तन की स्वरलहरी सुनाई देती है। इसी स्वरलहरी के सांनिध्य और स्पर्श से वृन्दावन के वृक्षों और लताओं में आज भी ‘राधेकृष्ण’की ध्वनि होती रहती है। भक्त शिरोमणि तुलसीदासजी ने अपने ब्रजप्रवास मे इसकी अनुभूति करते हुए कहा था–
बृन्दावन के वृक्ष को, मर्म न जाने कोय।
डार-डार अरु पात-पात में राधे राधे होय।।
भगवान श्रीकृष्ण का नाम चिन्तामणि, कल्पवृक्ष है–सब अभिलाषित फलों को देने वाला है। यह स्वयं श्रीकृष्ण है, पूर्णतम है, नित्य है, शुद्ध है, सनातन है। श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभु ने अपने ग्रंथ ‘श्रीचैतन्य-चरितामृत’ में कहा है–
सांसारिक तथा आध्यात्मिक सब प्रकार के लाभ देने में श्रीकृष्ण का नाम स्वयं श्रीकृष्ण के तुल्य है। नाम, विग्रह, स्वरूप–तीनों एक हैं; एक ही सत्ता की इन तीन दशाओं में कोई भेद नहीं है। तीनों चिदानन्दरूप हैं।

भगवान श्रीकृष्ण के कुछ प्रचलित नाम व उनका भावार्थ

भगवान के नाम अनन्त हैं, उनकी गणना कर पाना किसी के लिए भी सम्भव नहीं। यहां कुछ थोड़े से प्रचलित नामों का अर्थ दिया जा रहा है–
  • कृष्ण’कृष्ण’ शब्द की महाभारत में व्याख्या विलक्षण है। भगवान ने इस सम्बन्ध में स्वयं कहा है–’मैं काले लोहे की बड़ी कील बनकर पृथ्वी का कर्षण करता हूँ और मेरा वर्ण भी कृष्ण है–काला है, इसीलिए मैं ‘कृष्ण’ नाम से पुकारा जाता हूँ।
  • परमात्मा–सृष्टि का जो मूल कारण है; जिसके संसर्ग के बिना प्रकृति में सृजन-क्रिया सम्भव नहीं, उस सर्वव्यापक चित् तत्त्व को परमात्मा कहते हैं।
  • हरि–इस प्रसिद्ध नाम की व्युत्पत्ति दो प्रकार से दी गयी है–(१) जो यज्ञ में हवि के भाग को ग्रहण करते हैं वे प्रभु यज्ञभोक्ता होने से हरि कहलाए। (२) हरिन्मणि (नीलमणि) के समान उनका रूप अत्यन्त सुन्दर एवं रमणीय है।
  • अच्युत–जिनके स्वरूप, शक्ति, सौन्दर्य, ऐश्वर्य, ज्ञानादि का कभी किसी काल में, किसी भी कारण से ह्रास नहीं होता, वे भगवान अच्युत कहे जाते हैं।
  • भगवान–ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ज्ञान और वैराग्य–भगवान इन छहों ऐश्वर्यों से पूर्णतया युक्त हैं।
  • माधव–मायापति अथवा लक्ष्मीपति होने से भगवान का नाम माधव है।
  • गोविन्द–भगवान श्रीकृष्ण ने गिरिराज धारण कर इन्द्र के कोप से गोप-गोपी और गायों की रक्षा की। अभिमान-भंग होने पर इन्द्र और कामधेनु ने  उन्हें ‘गोविन्द’ नाम से विभूषित किया। गौओं ने अपने दूध से भगवान श्रीकृष्ण का अभिषेक कर उन्हें गोविन्द–गौओं का इन्द्र बनाया।
  • गोपाल–गायों का पालन करने वाले।
  • हृषीकेश–हृषीक कहते हैं इन्द्रियों को। जो मन सहित समस्त इन्द्रियों का स्वामी है, वह हृषीकेश है।
  • पृश्निगर्भ–पृश्निगर्भ के अर्थ हैं–अन्न, वेद, जल तथा अमृत। इनमें भगवान निवास करते हैं; अत: पृश्निगर्भ कहलाते हैं।
  • वासुदेव–जिस प्रकार सूर्य अपनी किरणों से समस्त जगत् को आच्छादित करता है, उसी प्रकार इस विश्व को आच्छादित करने के कारण भगवान ‘वासुदेव’ कहलाते हैं।
  • केशव–केशव कहलाने के तीन कारण हैं–(१) अत्यन्त सुन्दर केशों से सम्पन्न होने से ‘केशव’ हैं। (२) केशी के वध के कारण ‘केशव’ हैं। (३) ब्रह्मा, विष्णु और शिव जिसके वश में रहकर अपने कार्यों का सम्पादन करते हैं, वह परमात्मा है केशव।
  • ईश्वर–उत्पत्ति, पालन, प्रलय में सब प्रकार से समर्थ होने के कारण ईश्वर कहलाते हैं।
  • पद्मनाभ–जिसकी नाभि में जगतकारणरूप पद्म स्थित है, वे पद्मनाभ कहे जाते हैं।
  • पद्मनेत्र–कमल के समान नेत्र वाले।
  • जनार्दन–जो प्रलयकाल में सबका नाश कर देते हैं अथवा जो अवतार लेकर दुष्टजनों का दमन करते हैं और भक्तलोग जिनकी प्रार्थना करते हैं; वे जनार्दन कहे जाते हैं।
  • नारायण–’नार’ कहते हैं–जल को, ज्ञान को और नर को। ज्ञान के द्वारा जिन्हें प्राप्त किया जाय, वे नारायण हैं। और नर के सखा हैं और जल में घर बनाकर (क्षीरसागर में) रहते हैं।
  • मुकुन्द–मुक्तिदाता होने से भगवान को मुकुन्द कहा जाता है
  • प्रभु–सर्वसमर्थ।
  • मधसूदन–प्रलय-समुद्र में मधु नामक दैत्य को मारने वाले।
  • मुरारी–मुर दैत्य के नाशक।
  • दयानिधि–दया के समुद्र।
  • कालकाल–काल के भी महाकाल।
  • नवनीतहर–माखन का हरण करने वाले।
  • बालवृन्दी–गोप-बालकों के समुदाय को साथ रखने वाले।
  • मर्कवृन्दी–वानरों के झुंड के साथ खेलने वाले।
  • यशोदातर्जित–यशोदा माता की डांट सहने वाले।
  • दामोदर–मैया द्वारा रस्सी से कमर में बांधे जाने वाले।
  • भक्तवत्सल–भक्तों से प्यार करने वाले।
  • श्रीधर–वक्ष:स्थल में लक्ष्मी को धारण करने वाले।
  • प्रजापति–सम्पूर्ण जीवों के पालक।
  • गोपीकरावलम्बी–गोपियों के हाथ को पकड़कर नाचने वाले।
  • बलानुयायी–बलरामजी का अनुकरण करने वाले।
  • श्रीदामप्रिय–श्रीदामा के प्रिय सखा।
  • अप्रमेयात्मा–जिसकी कोई माप नहीं ऐसे स्वरूप से युक्त।
  • गोपात्मा–गोपस्वरूप।
  • हेममाली–सुवर्णमालाधारी।
  • आजानुबाहु–घुटने तक लंबी भुजा वाले।
  • कोटिकन्दर्पलावण्य–करोड़ों कामदेवों के समान सौन्दर्यशाली।
  • क्रूर–दुष्टों को दण्ड देने के लिए कठोर।
  • व्रजानन्दी–अपने शुभागमन से सम्पूर्ण व्रज का आनन्द बढ़ाने वाले।
  • व्रजेश्वर–व्रज के स्वामी।
जीवन की जटिलताओं में फंसे, हारे-थके, आत्म-विस्मृत सम्पूर्ण प्राणियों के लिए आज के जीवन में भगवन्नाम ही एकमात्र तप है, एकमात्र साधन है, एकमात्र धर्म है। इस मनुष्य जीवन का कोई भरोसा नहीं है। इसके प्रत्येक श्वास का बड़ा मोल है। अत: उसका पूरा सदुपयोग करना चाहिए–
साँस-साँस पर कृष्ण भज, वृथा साँस मत खोय।
ना जाने या साँस को आवन होय, न होय।।